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वैदिक सूक्ष्म ज्ञान - पार्ट - १. Astro Classes, Silvassa.

अणिमा टिप्पणी : छान्दोग्य उपनिषद में ६.५.१ से ६.१२.१ तक अणिमा आदि सिद्धियों की विभिन्न उदाहरणों द्वारा व्याख्या की गई है।

अणु टिप्पणी : वैशेषिक दर्शन ७.१.२३ के अनुसार विभुत्व के अभाव में मन अणु है । मैत्रायणी उपनिषद ७.११ में हृदय में खजाग्नि ? के संयोग से एक अणु, कण्ठदेश में दो अणु तथा जिह्वाग्र देश में तीन अणु होने का उल्लेख है।

अण्ड टिप्पणी : तैत्तिरीय आरण्यक ३.११.४ के अनुसार अण्डकोश में भुवन छिपा हुआ है । सूत्रात्म शरीर को प्राण वायु गर्भ के जरायु की भांति घेरे हुए है । यह सुवर्णकोश रजस से आवृत है । शतपथ ब्राह्मण ६.१.२.१ में अण्ड के क्रमिक विकास का वर्णन किया गया है । प्रजापति सर्वप्रथम अग्नि द्वारा पृथिवी के साथ मिथुन करके अण्ड उत्पन्न करते हैं, फिर वायु द्वारा अन्तरिक्ष के साथ, फिर आदित्यों द्वारा दिवः के साथ । शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.१ के अनुसार जब तक अण्ड का भेदन नहीं होता, तब तक संवत्सर का दर्शन नहीं हो सकता । त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद २.५९ के अनुसार मनुष्य के कन्दस्थान की आकृति अण्डाकार है जिसमें नाभि और चक्र आदि स्थित हैं । योगकुण्डल्योपनिषद ३.२३ के अनुसार अण्ड को ज्ञानाग्नि से तप्त करके कारण देह में प्रवेश किया जा सकता है।

बालाजी वेद, वास्तु एवं ज्योतिष विद्यालय, सिलवासा ।।

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