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नौकरी करवाना और नौकरी करना ये दो बातें कुण्डली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है ।।

नौकरी करवाना और नौकरी करना दो अलग अलग बातें है और ये कुण्डली में शनि की स्थिति पर निर्भर है । To get a job and work are two different things.
 Hanuman Ji Maharaj.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


मित्रों, नौकरी करवाना और नौकरी करना दो अलग अलग बातें है । जन्म कुण्डली में अगर शनि नीच का है तो नौकरी करवाता है । परन्तु वही शनि अगर उच्च का होगा तो जातक के अंडर में नौकर रखवाता है और उनसे काम करवाता है । तुला का शनि उच्च का होता है और मेष का शनि नीच का होता है । मेष राशि से जैसे जैसे शनि तुला राशि की तरफ़ बढता जाता है उच्चता की ओर अग्रसर होता जाता है । तथा तुला राशि से शनि जैसे जैसे आगे बढ़ता है अपनी नीच अवस्था की तरफ़ बढता जाता है ।।



अपनी कुण्डली में देख कर हम पता कर सकते हैं, कि कुण्डली में शनि कहां पर है । जिस स्थान पर शनि होता है उस स्थान के साथ शनि अपने से तीसरे स्थान पर, सातवें स्थान पर और दसवें स्थान पर अपना पूरा असर देता है । अगर शनि कुण्डली में नौकरी के स्थान का मालिक है, और शनि वृष राशि का है तथा वृष राशि धन की राशि है या भौतिक सामान की राशि है तो वृष राशि से अपने खुद की पारिवारिक स्थिति का पता किया जाता है ।।



वृष राशि में शनि नीच का होगा लेकिन उच्चता की तरफ़ बढता हुआ होगा, इसके प्रभाव से जातक धन और भौतिक सामान के संस्थान के प्रति काम करने के लिये उत्सुक रहेगा । इसके साथ ही शनि की तीसरी निगाह कर्क राशि पर होगी, अब क्योंकि कर्क राशि चन्द्रमा की राशि होती है, और कर्क राशि के लिये माता मन मकान पानी एवं पानी वाली वस्तुयें चांदी चावल जनता और वाहन आदि के बारे में जाना जा सकता है । तो जातक का ध्यान काम करने के प्रति भौतिक साधनों तथा धन के लिये इन क्षेत्रों में सबसे पहले ध्यान जायेगा ।।



उसके बाद शनि की सातवीं दृष्टि वृश्चिक राशि पर होगी, यह भी जल की राशि है और मंगल इसका स्वामी है । यह मृत्यु के बाद प्राप्त धन की राशि है, जो सम्पत्ति मौत के बाद प्राप्त होती है उसके बारे में इसी राशि से जाना जाता है । किसी की सम्पत्ति को बेचकर उसके बीच से प्राप्त किये जाने वाले कमीशन की राशि है, तो जातक जब नौकरी करेगा तो उसका ध्यान इन कामों की तरफ़ भी जायेगा ।।



इसके बाद शनि का असर दसवें स्थान में जायेगा, वृष राशि से दसवीं राशि कुम्भ राशि है, इसका भी मालिक शनि ही है और अधिकतर मामलों में इसे यूरेनस की राशि भी कहा जाता है । कुम्भ राशि को मित्रों की राशि और बडे भाई की राशि कहा जाता है, जातक का ध्यान उपरोक्त कामों के लिये अपने मित्रों और बडे भाई की तरफ़ भी जाता है । अथवा वह इन सबके सहयोग के बिना नौकरी नहीं प्राप्त कर सकता है । यह राशि संचार के साधनों की राशि भी कही जाती है । ऐसा जातक अपने कार्यों और जीविकोपार्जन के लिये संचार के अच्छे से अच्छे साधनों का प्रयोग भी करेगा ।।



अगर इस शनि पर मंगल का असर किसी प्रकार भी हो तो जातक के अन्दर तकनीकी भाव पैदा होगा । वह चन्द्रमा की कर्क राशि का प्रयोग मंगल के असर के कारण भवन बनाने तथा निर्माण कार्यों के लिये सामान बेचने का काम करेगा । वह चन्द्रमा से खेती और मंगल से दवाइयों वाली फ़सलें पैदा करने का काम करेगा । अथवा ऐसे लोग कृषि से सम्बन्धित तकनिकी औजारों को बनाने वाली कम्पनी में सम्भवतः नौकरी भी कर सकता है ।।



इसी तरह से अन्य भावों का भी विवेचन किया जाता है । शनि के द्वारा नौकरी नहीं दी जाती है परन्तु शनि पर किसी अन्य ग्रहों का प्रभाव तो होता है । परन्तु अन्य ग्रहों का जो प्रभाव शनि पर होता है, जिसके वजह से शनि कमजोर हो जाता है और नौकरी देता है तो ऐसी स्थिति में शनि को मजबूत भी किया जा सकता है । वैदिक ज्योतिष में तथा लालकिताब वगैरह अन्य प्रकार के ग्रंथों में शनि को बलवान बनाने के लिये तरह-तरह के उपाय बताये गये हैं ।।



कई लोग इन उपायों को टोटका बताते है कोई जादू कहता है, कुछ लोग इन उपायों को बेकार की दकियानूसी बातें कहते हैं । कोई अंधविश्वास की संज्ञा देता है, कोई पंडितों द्वारा लूटने की प्रक्रिया कहता है । जैसा समाज होता है वैसी बातें सुनने को मिलता है । लेकिन इन बातों का कोई आस्तित्व नहीं है कारण सत्य-सत्य होता है । अगर किसी बात को हम जबरदस्ती किसी पर थोपते हैं तो वो ज्यादा दिन तक टिकती नहीं है । जैसे ही पीढीयां बदलती है, उस बात को कोई महत्व ही नहीं रह जाता ।।



मित्रों, अच्छा या बुरा तो एक बच्चा भी समझता है । हमारे से भी बडे-बडे विद्वान इस पृथ्वी पर आ चुके है । हमसे भी बडे तर्क करने वाले इस धरा पर उत्पन्न हो चुके हैं । अगर ज्योतिष या इसके द्वारा बताये गये कारण गलत होते तो न जाने कब का यह विषय लुप्त हो चुका होता । वैदिक ज्योतिषानुसार समय की गणना आज से 2072 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने उज्जैन नगरी से शुरु की थी, और उन्ही के नाम से आज भी विक्रमी संवत चलता आ रहा है । एक भी गणना आज तक गलत नहीं हुयी है, और उसी समय पर सूर्य उदय और अस्त होता है ।।



प्रत्येक ग्रह उसी चाल के अनुसार चलता चला जा रहा है, एक सेकेण्ड का भी फ़र्क नहीं दिखाई देता है । जो बातें आज से 2072 साल पहले लिख दीं गयीं थीं, वे आज भी चल रहीं है । जिन स्थानों के लिये बढने और घटने का स्पष्टीकरण उस समय किया गया था, आज भी सभीकुछ वैसे का वैसा ही हो रहा है । जब शास्त्रानुसार बताये गये कारण और निवारण अपनी जगह पर सही हैं तो हमें भी कुतर्कों से बचना चाहिये ।।



मनुष्य अपने अहँकार के कारण कुछ भी कहते रहता है । लेकिन चलती हवा को रोकने की ताकत किसी मनुष्य के अन्दर नहीं है । मेरा अनुभव है, कि जो कोई भी वैदिक व्यवस्था से दूर जाने की कोशिश की वह कभी आबाद नहीं दिखा ।।



मित्रों, अच्छी नौकरी पाने के लिये शनि के कुछ उपाय बताता हूँ । नौकरी का मालिक शनि है लेकिन शनि की युति अगर छठे भाव के मालिक से हो और दोनों का सम्बन्ध कैसे भी छठे भाव से हो तो नौकरी के लिये अत्यन्त शुभ योग होता है । अगर किसी प्रकार से छठे भाव का मालिक अगर क्रूर ग्रह से युति बनाये अथवा राहु-केतु या अन्य किसी अशुभ स्थान पर बैठें अथवा दशवें भाव के मालिक का धन स्थान या लाभ स्थान से सम्बन्ध नहीं हो तो नौकरी के लिये शुभ योग अथवा समय नहीं होगा । आपके पास बार बार नौकरी का बुलावा आये और आप नौकरी के लिये चुने नहीं जाते हैं तो इसमें यही कारण हो सकता है ।।



नौकरी के लिये तीन बातें बहुत जरूरी होती है, पहली वाणी, दूसरी खोजी नजर और तीसरी जो नौकरी के बारे में इन्टरव्यू आदि ले रहा है उसकी मुखाकृति और हाव भाव से उसके द्वारा प्रकट किये जाने वाले विचारों को उसके पूछने से पहले ही समझ जाना और जब वह पूछे तो उसके पूछने के तुरत बाद ही उसका उत्तर दे देना । इसके लिए - वाणी के लिये बुध, खोजी नजर के लिये मंगल और बात करने से पहले ही समझने के लिये चन्द्रमा - ये मजबूत होने चाहियें ।।



नौकरी से मिलने वाले लाभ का घर चौथा भाव है, इस भाव के कारकों को समझना भी जरूरी होता है । चौथे भाव में अगर कोई खराब ग्रह बैठा हो और दशम अर्थात नौकरी के भाव का मालिक कोई शत्रु ग्रह हो तो वह चाह कर भी नौकरी नहीं करने देगा । इसके लिये उसे चौथे भाव से हटाने की क्रिया पहले से ही करनी चाहिये 



उदाहरण के लिए अगर मंगल चौथे भाव में हो और दशम भाव का मालिक बुध हो तो ऐसी स्थिति में मंगल के लिये "शहद चार दिन लगातार बहते पानी में बहाना चाहिए" । अथवा अगर शनि चौथे भाव में हो और दशम भाव का मालिक सूर्य हो तो चार नारियल लगातार पानी में प्रवाहित करने से सब अनुकूल होता है । इसी प्रकार से अन्य ग्रहों का भी उनके अनुसार उपाय किया जाना चाहिए ।।


अगले अंक में लगातार जारी.......


सटीक मानसागरी पद्धति - कुण्डली के किसी भी भाव में जब कोई भी दो ग्रह एक साथ बैठते हैं, तो क्या देते हैं और क्या नहीं देते । किन ग्रहों का एक साथ बैठना हमारे लिए शुभ होता है और किन-किन ग्रहों का योग जातक के लिए अशुभ होता है ? सटीक मानसागरी पद्धति में वर्णित बाकी के ग्यारह श्लोकों का विस्तृत विवेचन । जानिए इस विडियो टुटोरियल में - 





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