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नवरात्र में सिद्धि एवं साधना तथा व्रत और उपवास के कुछ सरल एवं प्रमाणिक शास्त्रीय सिद्धान्त ।। Navaratri Me Siddhi Kaise Karen.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,



धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः ।।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।
इसके अलावा क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रिय-संयम, देवपूजा, अग्निहोत्र, सन्तोष तथा चोरी न करना । ये 10 नियम किसी भी प्रकार के व्रत-उपवास में आवश्यक माने गए है । ये बात मनुस्मृति के अलावा अग्निपुराण में भी लिखा है ।।

जल, फल, मूल, दूध, घी, औषध एवं ब्राह्मणों की इच्छा की पूर्ति तथा गुरु का वचन ये 8 व्रत उपवास के शुभ फल के वर्धक होते है नाशक नहीं । ये बात स्पष्टतापूर्वक वृद्घगौतमस्मृति में लिखी हुई है । हाँ परन्तु बार बार जल पीने से, नशा पान से, दिन में सोने से तथा मैथुनादी करने से कोई भी व्रत-उपवास खण्डित हो जाता है । ये बात अग्निपुराण में लिखी हुई है ।।

उपवास के दिन शरीर में तेल नही लगाना चाहिए (मत्स्यपुराण) । उपवास के दिन लकड़ी का दातुन भी नहीं करना चाहिए (वाधूलस्मृति) । व्रत वाले दिन कांसे का बर्तन, मसूर, चना, कोदो, साग, शहद, पराया अन्न, स्त्री का संग, सुंदर वस्त्र तथा इत्रादि का परित्याग करना चाहिए (अग्निपुराण) ।।

नवरात्री के इन नव दिनों में माता चंडी की वृहत रूप से उपासना स्वयं करनी चाहिए अथवा किसी विद्वान् ब्राह्मण से करवानी चाहिए । परन्तु किसी भी वजह से अगर ये सम्भव न हो तो स्वयं अपने घर में नवरात्री के प्रथम दिन कलश स्थापन करके अथवा करवाकर माताजी का भावपूर्ण तरीके से पूजन करना चाहिए । उसके बाद "नवार्ण मन्त्र की साधना" जिसमें अधिक-से-अधिक जप करना चाहिए ।।


नवरात्री वर्ष में चार बार आती है, जिसमें से दो नवरात्रियाँ गुप्त होती है । तथा चैत्र एवं मार्गशीर्ष महीने की नवरात्रियाँ कुछ ज्यादा ही प्रभावी एवं सिद्धियों की दात्री होती हैं । जीवन की किसी भी विशिष्ट मनोकामना की पूर्ति हेतु इन नवरात्रियों में उपवास एवं व्रत अवश्य करना चाहिए । कम-से-कम नवार्ण मन्त्र की साधना तो अवश्य ही करनी चाहिये ।।

इसका विधान भी कुछ विशिष्ट नहीं है अपितु लाभ कई गुना ज्यादा अवश्य ही होता है । सर्वप्रथम माताजी का विधि-विधान से पूजन करें एवं माला को निचे पलाश अथवा पीपल के पत्ते पर रखें । माला का पूजन करें और उसके बाद प्रार्थना करें ।।

माला-प्रार्थना:-
ॐ मां माले महामाये ! सर्वशक्तिस्वरूपिणी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥१॥
अविघ्नं कुरु माले! त्वं गृहणामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्धयर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥२॥

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्व मंत्रार्थ साधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा ।।

इस प्रकार प्रार्थना करके जितना अधिक-से-अधिक जप कर सकें करें ।। अथ मन्त्रः - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।

शास्त्रों में नवार्ण मन्त्र को अपने आप में अत्यन्त सिद्ध एवं तत्काल प्रभावयुक्त माना गया हैं । नवार्ण मन्त्र को मन्त्र और तन्त्र दोनों में समान रुप से प्रयोग किया जाता हैं । इतना ही नहीं नवार्ण मन्त्र के शीघ्र प्रभावी प्रयोग भी आपके मार्गदर्शन हेतु हम यहाँ वर्णित कर रहे हैं । परन्तु एक विशेष सावधानी अवश्य रखनी चाहिये नवार्ण मन्त्र का प्रयोग अति सावधानी से एवं योग्य गुरु, विद्वान ब्राह्मण अथवा जानकार की सलाह से ही करना चाहिए ।।

नवार्ण मोहन मन्त्र:- "नवार्ण मोहन मन्त्र" का बारह लाख जप करने का विधान हैं । इस प्रयोग को करने हेतु सात कुँओं अथवा सात नदियों का जल ताम्रकलश में लेकर उसमें आम के पत्ते डालकर नित्य उसी पानी से स्नान करना चाहिए । ललाट पर पीले चन्दन का तिलक लगाना चाहिए । इस काल में पीले रंग के वस्त्र ही धारण करने चाहिए और पीले रंग के आसन का प्रयोग करना चाहिए ।।

साधक को पश्चिम की तरफ मुंह करके बैठकर जप करना चाहिए । इस मन्त्र का बारह लाख जप करने से यह मन्त्र सिद्ध हो जाता हैं । जो मोहिनी के लिये प्रयोग किया जाता है, वो "नवार्ण मोहन मन्त्र" इस प्रकार है - ॐ क्लीं क्लीं ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे (अमुकं) क्लीं क्लीं मोहनम् कुरु कुरु क्लीं क्लीं स्वाहा ।।

मित्रों, वैसे तो ये सादा नवार्ण मन्त्र ही किसी भी प्रकार की सम्पूर्ण सिद्धि हेतु पर्याप्त होता है । परन्तु विशिष्ट साधना हेतु इसी मन्त्र को विशिष्ट प्रकार से प्रयुक्त करना चाहिये । लेकिन मूल मन्त्र यही है "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" । नवार्ण-मन्त्र अत्यन्त शक्तिशाली है तथा इसके प्रयोग से सभी प्रकार के कार्य सिद्ध हो जाते हैं ।।


सप्तशती में इसका सम्पुट भी लगाने का विधान मिलता है । नवार्ण-मन्त्र से षट्-कर्म करने के लिये उसके रूप में प्रयोजन के अनुसार परिवर्तन-परिवर्धन कर लिया जाता है । जैसे - ‎वशीकरण‬ के लिए - "वषट्" ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे "वषट् में" कुरु स्वाहा । ‎उच्चाटन‬ के लिए - "फट्" ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे "फट्" उच्चाटनं कुरु-कुरु स्वाहा । इसी मन्त्र को ‎सम्मोहन‬ के लिए प्रयुक्त करना हो तो "क्लीं क्लीं" ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे "क्लीं क्लीं" मोहनं कुरु-कुरु स्वाहा ।।

‎स्तम्भन‬ हेतु "ऊँ ठं ठं" ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे "ह्रीं वाचं मुखं पदं स्तम्भय-स्तम्भय ह्रीं जिह्वां कीलय-कीलय ह्रीं बुद्धिं विनाशय -विनाशय ह्रीं ऊँ ठं ठं" स्वाहा । ‎आकर्षण‬ के लिए - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे "यं यं शीघ्रमाकर्षयाकर्षय" स्वाहा । ‎मारण‬ के लिए - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे "रं रं खें खें मारय-मारय रं रं भस्मी कुरु-कुरु" स्वाहा ।।

मित्रों, जिस प्रकार का आपको प्रयोग करना हो उसमें आगे के मंत्राक्षरो के बाद जो मूल नवार्ण मन्त्र के बाद (उस व्यक्ति का नाम जिसपर प्रयोग कर रहे हैं) लेना चाहिए । कुछ लोगों को देखता हूँ, कि अनुस्वार को (ङ् अर्थात एंग - इस प्रकार) बोलने की एक अशुद्ध नियम ही निकल पड़ी हैं । अनुस्वार को 'म्' ही बोला जाना चाहिये ।।

व्याकरण के अनुसार 'मोनुस्वारः' का नियम है अर्थात् मकार को ही अनुस्वार से लिखा जाता है और अनुस्वार को बोलते समय म् ही बोला जाना चाहिये । 'ऐं' को ' ऐम् ' ही बोलना चाहिए ' ऐङ् ' नहीं । पहले प्रकार से बोलने पर अर्थ बदल जाता है, और अर्थ बदलने से उसका प्रभाव व परिणाम भी बदल जाता है, यह बात व्यवहार से सिद्ध है ।।

दूसरी बात यह है कि अनुस्वार का मकार चेतन भी है और पुरुष भी है 'ङ्' में यह बात नहीं है- शास्त्र कहते हैं 'मकारः पुरुषो यतः' मकार के देखकर प्रत्येक वर्गान्त अक्षर को अनुस्वार के रूप में लिखने और अशुद्ध उच्चारण करने की एक परम्परा चल पड़ी है । जैसे - मन्त्र को मंत्र, अङ्ग को अंग, प्रत्यञ्चा को प्रत्यंचा, काण्ड को कांड लिखना आजकल सामान्य सा व्यवहार हो गया है ।।

संस्कृत में अनुस्वार को "म" ही बोलना चाहिए क्योंकि भाषा में इसके वजह से काफी अन्तर पड़ता है । क्योंकि इस प्रकार उच्चारण करने पर साधारण बोलचाल की भाषा में भी अन्तर हो जाता है । इसी प्रकार अगर यह कुप्रवृत्ति मन्त्रों में भी लागू हो जाय तो अनर्थ हो जाता है । कहने की आवश्यकता नहीं कि बीजमन्त्र शक्ति का आणविक रूप हैं उनके बार-बार जप करने से उसकी केन्द्रीय शक्ति प्रकट होती है जबकि भाषा का कितना असर होता है ये हम सभी जानते हैं ।।

बालाजी वेद, वास्तु एवं ज्योतिष विद्यालय, सिलवासा ।।

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