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जीवन में धन-प्रतिष्ठा, पितृ दोष एवं सूर्य की स्थिति ।। Surya, Wealth and Pitrudosha.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


मित्रों, सूर्य समस्त ग्रहों का राजा है और इसे समस्त प्राणी जगत को जीवन प्रदान करने वाली उर्जा का केंद्र माना जाता है । सूर्य को ज्योतिष की गणनाओं के लिए पुरुष ग्रह माना जाता है ।।

प्रत्येक व्यक्ति की कुण्डली में सूर्य को आम तौर पर उसके पिता का प्रतिनिधि माना जाता है । सूर्य जातक के इस प्राणी जगत में जन्म लेने का प्रत्यक्ष कारक ग्रह भी होता है ।।

ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्य को इस प्राणी जगत को चलाने वाले प्रत्यक्ष देवता का रुप माना जाता है । कुण्डली में सूर्य को जातक के पूर्वजों का प्रतिनिधि भी माना जाता है ।।

मित्रों, किसी कुण्डली में एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव सूर्य पर हो तो उस कुण्डली में स्वयं पितृ दोष निर्मित हो जाता है । इसके वजह से जातक के जीवन में मुसीबतें तथा समस्याएं सदैव बनी रहती है ।।

मित्रों, पिता तथा पूर्वजों के अतिरिक्त सूर्य को राजाओं, राज्यों, प्रदेशों तथा देशों के प्रमुखों, उच्च पदों पर आसीन सरकारी अधिकारियों, सरकार, ताकतवर राजनीतिज्ञों तथा पुलिस अधिकारीयों........

चिकित्सकों एवं ऐसे कई अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं का प्रतिनिधि भी माना जाता है । सूर्य को प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा का, जीवन दायिनी शक्ति का, इच्छा शक्ति का........

रोगों से लड़ने की शक्ति का, आँखों की रोशनी का, संतानोत्पत्ति की शक्ति का तथा विशेष रूप से नर संतान पैदा करने की शक्ति का, नेतृत्व करने की क्षमता का तथा अधिकार एवं नियंत्रण की शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है ।।

मित्रों, व्यक्ति के शरीर में सूर्य पित्त प्रवृति का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि सूर्य ग्रह के स्वभाव तथा अधिकार में अग्नि तत्व होता है ।।

बारह राशियों में सूर्य अग्नि राशियों ( मेष, सिंह तथा धनु ) में स्थित होकर विशेष रूप से बलवान हो जाते हैं तथा मेष राशि में स्थित होने से सूर्य को सर्वाधिक बल प्राप्त होता है ।।

इसी कारण इस राशि में सूर्य को उच्च का माना जाता है । मेष राशि के अतिरिक्त सूर्य सिंह राशि (स्वगृही) में स्थित होकर भी बली हो जाते हैं ।।

सिंह सूर्य की अपनी राशि है तथा इसके अतिरिक्त सूर्य धनु राशि में भी बलवान होते हैं जिसके स्वामी गुरू हैं । जिन व्यक्तियों की जन्मकुण्डली में सूर्य बलवान.......

तथा किसी भी बुरे ग्रह के प्रभाव से रहित होते हैं ऐसे जातक आम तौर पर जीवन भर स्वस्थ रहते हैं क्योंकि सूर्य को सीधे तौर पर व्यक्ति के निरोग रहने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है ।।

कुण्डली में सूर्य के बलवान होने से जातक की रोग निरोधक क्षमता सामान्य से अधिक होती है । इसी कारण उसे आसानी से कोई रोग परेशान नहीं करता ।।

ऐसे व्यक्तियों का हृदय बहुत अच्छी तरह से काम करता है जिससे इनके शरीर में रक्त का संचार बड़े सुचारू रूप से होते रहता है । ऐसे लोग शारीरिक तौर पर बहुत चुस्त-दुरुस्त होते हैं ।।

मित्रों, आम तौर पर इनके शरीर का वज़न भी सामान्य से बहुत अधिक या बहुत कम नहीं होता । हालांकि इनमें से कुछ तथ्य कुण्डली में दूसरे ग्रहों की शुभ या अशुभ स्थिति के साथ बदल भी सकते हैं ।।

जन्मकुण्डली में सूर्य के बलवान होने पर जातक सामान्यतया समाज में विशेष प्रभाव रखने वाला होता है । अपनी संवेदनाओं और भावनाओं पर भली भांति अंकुश लगाने में भी सक्षम होता है ।।

मित्रों, ऐसे जातक आम तौर पर अपने जीवन के अधिकतर निर्णय तथ्यों के आधार पर ही लेते हैं । भावुकता के आधार पर कोई फैसला नहीं लेते ।।

ऐसे लोग सामान्यतया अपने निर्णय पर अड़िग भी रहते हैं । इस कारण इनके आस-पास के लोग इन्हें कई बार अभिमानी भी समझ लेते हैं ।।

इस प्रकार के जातक आमतौर पर अहंकारी कई बार दिखते भी हैं किन्तु अधिकतर मौकों पर ऐसे लोग तर्क के आधार पर लिए गए सही निर्णय का पालन भी करते हैं ।।

मित्रों, स्वाभाव से अधिक कठोर दिखने के वजह से इनके आस-पास के लोग इन्हें अभिमानी समझते हैं । अपने इन गुणों के कारण ऐसे लोगों में बहुत अच्छे नेता, राजा तथा न्यायाधीश बनने की भी क्षमता होती है ।।

पुरुष जातकों की कुण्डली में सूर्य का बलवान होना तथा किसी बुरे ग्रह से रहित होना उन्हें स्वस्थ तथा बुद्धिमान संतान पैदा करने की क्षमता देता है ।।

सूर्य प्रभावी जातकों को विशेष रुप से नर संतान पैदा करने की क्षमता प्राप्त होती है । बलवान सूर्य वाले जातक आम तौर पर बहुत सी जिम्मेदारियों को उठाने वाले और उन्हें निभाने वाले भी होते हैं ।।

मित्रों, जिसके कारण आवश्यकता से अधिक काम करने के कारण कई बार इन्हें शारीरिक अथवा मानसिक तनाव का सामना भी करना पड़ता है ।।

ऐसे लोग आम तौर पर पेट में वायु विकार जैसी समस्याओं तथा त्वचा के रोगों से पीड़ित हो सकते हैं । जिसका कारण सूर्य का अग्नि स्वभाव होता है ।।

जिससे पेट में कुछ विशेष प्रकार के विकार तथा रक्त में अग्नि तत्व की मात्रा बढ़ जाने से त्वचा से संबधित रोग भी हो सकते हैं ।।

मित्रों, बारह राशियों में से कुछ राशियों में सूर्य का बल सामान्य से कम हो जाता है । यह बल सूर्य के तुला राशि में स्थित होने पर सबसे कम हो जाता है ।।

इसी कारण सूर्य को तुला राशि में स्थित होने पर नीच माना जाता है । क्योंकि तुला राशि में स्थित होने पर सूर्य अति बलहीन हो जाते हैं ।।

इसके अतिरिक्त सूर्य कुण्डली में अपनी स्थिति के कारण तथा एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों के प्रभाव में आने के कारण भी बलहीन हो जाते हैं ।।

मित्रों, इनमें से अंतिम प्रकार की बलहीनता जातक के लिए सबसे अधिक नुकसानदायक होती है । किसी कुण्डली में यदि सूर्य तुला राशि में स्थित हों.....

तथा तुला राशि में ही स्थित अशुभ शनि के प्रभाव में हों तो ऐसी हालत में सूर्य को भारी दोष लगता है । क्योंकि तुला राशि में स्थित होने के कारण सूर्य पहले ही बलहीन हो जाते हैं.....

तथा दूसरी तरफ तुला राशि में स्थित होने पर शनि को सर्वाधिक बल प्राप्त होता है । क्योंकि तुला राशि में स्थित शनि उच्च के हो जाते हैं ।।

ऐसी स्थिति में पहले से ही बलहीन सूर्य पर पूर्ण रूप से बली शनि ग्रह का अशुभ प्रभाव सूर्य को बुरी तरह से दूषित तथा बलहीन कर देता है ।।

मित्रों, ऐसे में कुण्डली में भयंकर पितृ दोष का निर्माण हो जाता है जिसके कारण जातक के जीवन में सूर्य के प्रतिनिधित्व में आने वाले सामान्य तथा विशेष सभी क्षेत्रों पर दुष्प्रभाव पड़ता है ।।

इसलिए किसी भी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन करते समय कुण्डली में सूर्य की स्थिति, बल तथा कुण्डली के दूसरे शुभ तथा अशुभ ग्रहों के सूर्य पर प्रभाव को ध्यानपूर्वक देखना अति आवश्यक होता है ।।

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