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राज्यों का स्वामित्व, सम्पन्नता और राजा से पूजनीयता देता है देवगुरु बृहस्पति पर कैसे ? ।। Guru Deta Hai RajyaYoga.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है = भारी । अर्थात आपसे जो भी प्रभावी व्यक्तित्व हो वो गुरु की श्रेणी में आता है । जैसे माता-पिता, गुरु-आचार्य, चाचा-ताऊ, शिक्षक अथवा देवता हो या फिर कुछ देनेवाला दाता हो ये सभी गुरु की ही श्रेणी में आते हैं ।।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से गुरु जीवन में सर्वाधिक ऊँचाई देने वाला ग्रह माना गया है । जीवन में चाहे नेतृत्व की क्षमता हो अथवा अमीरी की पराकाष्ठ हो गुरु ही दे सकता है । जिसकी कुण्डली में गुरु केन्द्रेश अथवा त्रिकोणेश होकर स्वराशी अथवा अपनी उच्च राशी में बैठा हो उसे जीवन में किसी चीज की कमी नहीं रह जाती है ।।

वैसे गुरु के विषय में एक और बात कही गयी है ज्योतिष में, कि "किं कुर्वन्ति ग्रहाः सर्वे यस्य केन्द्रे बृहस्पति" । अर्थात जिसकी कुण्डली में किसी केन्द्र में बृहस्पति बैठा हो उसके बाकी ग्रह क्या बिगाड़ लेंगे ।।

परन्तु गुरु अगर अकारक अथवा मारक हो तो भी क्या यह सूत्र लागू होगा ? ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है । वैसे ये एक एकलौता प्रश्न नहीं है ज्योतिष में इस प्रकार के कई प्रश्न आज भी अपना मुँह खोले खड़े हैं जिनका उत्तर देने में बड़े-से-बड़े ज्योतिषियों के हवा निकल जाते हैं ।।

एक दिन एक फेसबुकिया ज्योतिषी जी हमारे आर्टिकल पर प्रश्न उठाने लगे । प्रश्न उठाना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन वो हमारी परीक्षा ले रहे हों, कुछ इस अन्दाज में प्रश्न पूछ रहे थे । फिर ये बात मुझे तो क्या किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा ।।

उन्होंने पूछा की क्या वृष राशी का चन्द्रमा किसी की कुण्डली में हो जिसका जन्म अमावस्या का हो तो उसे उच्च का माना जायेगा ? हमने कहा हमारे वैदिक पंचांग के अनुसार तीन सौ साठ दिन का वर्ष होता है जिसमें सामान्यतया अमावस्या बारह होती है अधिक मास लगे तो तेरह होती है ।।

जिसमें से केवल एक मार्गशीर्ष मास की अमावस्या के दिन ही चन्द्रमा वृष राशी का होता है । परन्तु तिथियों के आधार पर कहीं भी फलादेश की कोई बात कहीं नहीं मिलती । अपितु ग्रहों के बलाबल और श्रेष्ठता एवं नीचता के आधार पर ही फलादेश का विधान है ।।

तो तिथी चाहे कोई भी हो अगर चन्द्रमा वृषभ राशी का है तो वो उच्च का ही माना जायेगा और उसके फलादेश भी उसकी उच्चता को आधार मानकर ही किया जायेगा । उन्होंने कहा मैं अब आपके ज्ञान को समझ गया की आप कितने बड़े विद्वान् हैं ? ।।

मैंने पूछा आपने ज्योतिष का अध्ययन कहाँ से किया है ? उन्होंने कहा फेसबुक से । इसीलिए आप मेरी योग्यता को समझ गए । तो ऐसे लोग बहुत हैं, जो कॉपी-पेस्ट के आधार पर अपने-आप को बहुत बड़ा ज्योतिषी प्रमाणित करके अच्छी-खासी रकम कमाकर उसी पैसे से अपना एडवरटाईजमेंट करवा कर बड़े बने हुए हैं ।।

आप देखेंगे बहुत सी महिलायें हैं, जो ज्योतिषी बन बैठी हैं । जो बड़े-से-बड़े स्तोत्र के बारे में बताने लगती हैं, कि इसके पाठ से ये हो जायेगा । अब आप ही सोंचो ये कॉपी-पेस्ट नहीं तो और क्या है ? क्या उन्होंने कहीं किसी गुरुकुल से इस बात का अध्ययन किया है ? नहीं ।।

कोई बात नहीं इसी बहाने धर्म का प्रचार तो कर रही हैं न ? मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है । लेकिन लोगों को तो समझना चाहिए की सच्चा कौन है, उसको महत्ता देनी चाहिए जिससे उनका भी भला होना संभव हो ।।

मित्रों, हम बात कर रहे थे गुरु के विषय में । गुरु की दशा में अपने उच्च, अपनी राशी में, लग्न से केन्द्र अथवा त्रिकोण में गये हुये गुरु के अन्तर्दशा में अनेक राज्यों का स्वामित्व, सम्पन्नता और राजा से पूजनीयता प्राप्त होती है ।।

गौ, भैंस आदि का तथा वस्त्राभूषणों का लाभ होता है । नए स्थान का निर्माण एवं अपने खुद के घर के सपने पूर्ण होते हैं । यदि गुरु भाग्य अथवा कर्म भाव में हो तो जातक को हाथी-घोड़े अनेक प्रकार के वाहन एवं ऐश्वर्यों से भर देता है ।।

सरकारी खजाने से अधिकाधिक लाभ एवं स्त्री-पुत्र का लाभ भी होता है । यदि गुरु नीचांश अथवा नीच राशी में ६/८/१२वें में हो तो नीचों की संगति, महान दु:ख, दायादों से विरोध, भय, कलह एवं अपमृत्यु का भय बना रहता है ।।

ऐसा गुरु जातक को पुत्र-स्त्री से वियोग एवं धन-धर्म का भी नाश करवाता है । गुरु यदि सप्तमेश हो तो शारीरिक रोग देता है । तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् । रुद्रजाप्यं च गोदानं कुर्यादिष्टस्य प्राप्तये ।।

इस प्रकार के गुरु के दोष के परिहार हेतु अर्थात शुभ फल प्राप्ति के लिये शिवसहस्रनाम का जप, रुद्राष्टाध्यायी से रुद्राभिषेक, एवं गोदान करना चाहिए । कुण्डली में यदि गुरु शुभ न हो तो भी इन धार्मिक कृत्यों के करने मात्र से शुभ फल देता है ।।

अगले लेख में गुरु में शनि की अन्तर्दशा के फल का वर्णन करेंगे ।।

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