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शुभ और अशुभ ग्रहों को कैसे पहचानें ।। Shubh And Ashubh Grahon Ki Pahachan.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
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मित्रों, हमारे वैदिक ज्योतिष में ग्रहों को नैसर्गिक रूप से शुभ और अशुभ दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है । गुरु, शुक्र, पक्षबली चंद्रमा और शुभ प्रभावी बुध शुभ ग्रह माने गये हैं और शनि, मंगल, राहु व केतु अशुभ माने गये हैं ।।

सूर्य सभी ग्रहों का राजा है और उसे क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गई है । बुध, चंद्रमा, शुक्र और गुरु क्रमशः एक दुसरे से शुभ ग्रह माने गए हैं, जबकि सूर्य, मंगल, शनि और राहु अधिकाधिक अशुभ फलदायी माने जाते हैं ।।

मित्रों, जन्मकुण्डली के बारह घरों में छठा, आठवाँ और बारहवाँ घर अशुभ (त्रिक) भाव हैं, जिनमें अष्टम भाव सबसे अशुभ माना गया है । षष्ठ से षष्ठ अर्थात एकादश भाव, तथा अष्टम से अष्टम तृतीय भाव, कुछ कम अशुभ माने जाते हैं ।।

आठवें घर से बारहवाँ घर अर्थात सप्तम भाव और तीसरे से बारहवाँ अर्थात द्वितीय भाव को मारक भाव और भावेशों को मारकेश कहा गया है । केन्द्र का मालिक ग्रह एक बार को निष्फल होते हैं परंतु त्रिकोणेश सदैव शुभ होता है ।।

मित्रों, नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह केन्द्र के साथ ही तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव का स्वामी होकर अशुभ फलदायी हो जाते हैं । परन्तु ऐसी स्थिति में अशुभ ग्रह सामान्य फल देते हैं । अधिकांश कोई शुभ एवं बलवान ग्रह यदि 1, 2, 4, 5, 7, 9 और 10वें भाव में बैठे तो जातक को भाग्यशाली बनाता है ।।
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कोई ग्रह दुसरे और बारहवें भाव में बैठे तो ऐसा ग्रह अपनी दूसरी राशि के अनुसार ही फल देता है । कोई शुभ ग्रह वक्री हो तो अधिक शुभ और अशुभ ग्रह अधिक अशुभ फल देता है राहु व केतु यदि किसी भाव में अकेले हों तो उस भाव के भावेश के समान फल देते हैं ।।

मित्रों, राहू या केतु यदि किसी केन्द्र या त्रिकोण भाव में बैठें अथवा त्रिकोण या केंद्र के स्वामी से युति करें तो योगकारक ग्रहों जैसा शुभ फल देते हैं । लग्न कुण्डली में उच्च ग्रह शुभ फल देते हैं और नवांश कुण्डली में भी उसी राशि में होने पर "वर्गोत्तम" होकर उत्तमोत्तम फल देते हैं ।।

बलवान ग्रह शुभ भाव में स्थित होकर अधिक शुभ फल देते हैं । पक्षबलहीन चंद्रमा मंगल की राशियों, विशेषकर वृश्चिक राशि में नीच का होकर अधिक पापी हो जाता है । ऐसी स्थिति में चन्द्रमा यदि पक्षबली हो तो उसकी अशुभता में कमी आती है ।।

मित्रों, स्थानबल से हीन होकर कोई भी ग्रह तथा पक्षबल हीन चन्द्रमा अच्छा फल नहीं देते । महर्षि पाराशर के अनुसार प्रथम भाव का कारक ग्रह सूर्य होता है जबकि द्वितीय भाव का कारक ग्रह गुरु होता है । तृतीय भाव का मंगल, चतुर्थ भाव का चन्द्रमा एवं बुध तथा पंचम भाव का कारक ग्रह गुरु माना गया है ।।
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छठे भाव का कारक मंगल एवं शनि को माना गया है जबकि सप्तम भाव का कारक शुक्र को कहा जाता है । अष्टम भाव का शनि, नवम भाव का गुरु एवं सूर्य को तथा दशम भाव का कारक ग्रह सूर्य, बुध, गुरु एवं शनि को माना गया है ।।

मित्रों, जन्मकुण्डली के ग्यारहवें भाव का कारक गुरु को माना गया है जबकि बारहवें भाव का कारक शनि को माना गया है । अब इससे आगे यदि स्थिर कारक की बात करें तो सूर्य पिता का, चंद्रमा-माता का, बृहस्पति-गुरु एवं ज्ञान का तथा शुक्र पत्नी एवं सुख-सौभाग्य का कारक माना गया है ।।

बुध को विद्या का, मंगल को भाई का, शनि को नौकर का और राहु म्लेच्छ का स्थिर कारक ग्रह माना गया है । लग्नेश आत्मा का कारक होता है इसलिये उसकी दशा बहुत शुभकारी होती है । यदि आत्मा का कारक ग्रह ही अष्टमेश भी हो तो उसके शुभ फल में कुछ कमी आ जाती है ।।

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