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व्यवसाय और कैरियर में देवगुरु बृहस्पति की भूमिका ।। Business and Careers Me Brihaspati Grah Ki Bhumika.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, वृहस्पति गृह को देवताओं का गुरु माना गया है । यह एक स्वाभाविक रूप से शुभ ग्रह माना जाता है । बृहस्पति जातक को लगभग नब्बे प्रतिशत शुभ फल ही देता है । परन्तु यही गुरु जब अशुभ स्थिति में कुण्डली में निर्बल होता है, तो यह अत्यंत अशुभ फल जातक को देता है । गुरु इस सौर मण्डल का सबसे बड़ा और प्रभावी ग्रह माना गया है । इसकी परिधि दो भागों में लम्बी एवं सिरे पर गोल शास्त्रों में बतायी गयी है । इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा बर्फीली चादर से ढका होने के बाद भी इसका आगे का एवं बगल का भाग सामान्य तापक्रम वाला है और आधुनिक विज्ञान भी यही मानता है ।।

यदि यह विषुवत रेखा एवं सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी के जिस गोलार्द्ध के लिये वृहत्कोण 150 अंश से 180 के मध्य बनाता है, अर्थात पृथ्वी के दूसरे गोलार्द्ध में धरती के एक ध्रुव तथा भूमध्य विन्दु के साथ समबाहु त्रिभुज बनाता है तो पृथ्वी के दूसरी तरफ जिस हिस्से से वृहत्कोण बना रहा होता है, वहां भयंकर हिमपात, महामारी, क्षयरोग एवं अतिसार आदि का प्रकोप बढ़ जाता है ।।

मित्रों, यदि यह धरती के मध्य विन्दु से किसी ध्रुव के साथ समकोण त्रिभुज बनाता है तो दूसरी तरफ विषमबाहु त्रिभुज के शीर्ष पर बनने वाले विन्दु के इर्द गिर्द वाले भूखंड में भूकंप, उग्र बाढ़ का प्रकोप एवं बादल फटने के परिणाम स्वरुप भयंकर हानि करता है । किन्तु यदि दोनों तरफ समकोण त्रिभुज जब बनाता है तो शीर्ष विन्दु के इर्द गिर्द वाले भूखंड को उनकी पुरानी हानियों की भी भरपाई कर अत्यंत सुखी एवं संपन्न जीवन प्रदान करता है ।।


अध्ययन और अध्यापन के लिये गुरु ग्रह ज्यादा प्रभावी बताया गया है । इसके अलावा चंद्रमा, बुध भी सहायक ग्रहों के रूप में इस क्षेत्र में लोगों को आकृष्ट करते हैं । राशिगत आधार पर देखा जाय तो जन्मकुण्डली में लग्न, पंचम, दशम या एकादश भाव में गुरु या बुध की राशियां हों तो उनके प्रभाव से जातक अध्यापन के प्रति ज्यादा रुचि रखता है । उसे जब भी अवसर मिलता है वह अध्यापक के रूप में भी कार्य करने लगता है ।।

मित्रों, प्राचीन काल में शिक्षा का अर्थ ज्ञान प्राप्ति से ही होता था । आज के शिक्षा का अर्थ धन कमाना ही रह गया है । पहले के विद्यार्थी किसी योग्य विद्वान के निर्देशन में विभिन्न प्रकार की शिक्षा ग्रहण करते थे । इसके  अतिरिक्त उसे शस्त्र सञ्चालन एवं विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण भी दिया जाता था । किन्तु वर्तमान समय में यह सभी प्रशिक्षण गौण हो गए हैं ।।

हमारे देश में शिक्षा का पाश्चात्यीकरण जब से हुआ है, तबसे ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है । हमारे बच्चे विद्वान् होकर भी पाश्चात्य देशों की ओर देखने को विवश हैं । आज के शिक्षा की महत्ता नौकरी प्राप्ति के लिये बढ़ने और प्रतिस्पर्धात्मक युग में बालक के बोलने और समझने लगते ही माता-पिता उसकी शिक्षा के बारे में चिंतित हो जाते हैं । कुछ वर्षों बाद सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि कौन सा विषय पढ़ायें ? जिससे उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो ?

मित्रों, अब मैं बताता हूँ, कि कुण्डली में ग्रहों की कौन सी स्थिति उत्तम शिक्षा के योग बनाते हैं । द्वितीयेश या वृहस्पति किसी केन्द्र या त्रिकोण में हों तो उत्तम शिक्षा का योग बनता है । पंचम भाव में बुध बैठा हो अथवा देख रहा हो या फिर बृहस्पति और शुक्र की युति हो तो शिक्षा के उत्तम योग का निर्माण होता है । पंचमेश की पंचम भाव में वृहस्पति या शुक्र के साथ युति हो ? बृहस्पति, शुक्र और बुध में से कोई भी किसी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो शिक्षा का उत्तम योग निर्मित होता है ।। 

अध्यापन के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्ति हेतु कुण्डली का लग्न, तृतीय, पंचम, दशम और एकादश भाव मजबूत होना चाहिये । जब इन भावों और भावेशों का संबंध गुरु ग्रह से होता है तो जातक अध्यापन अथवा शिक्षा के व्यवसाय से जुड़ता है । षष्ठम भाव में स्थित गुरु भी जातक को अध्यापन के क्षेत्र से जोड़ता है । दशमेश अथवा दशम भाव में स्थित ग्रह का नवांशेश यदि गुरु ग्रह हो तो जातक अध्यापन पेशे को अपनाता है ।।

मित्रों, जीवन के शुरूआती काल में अध्यापन के क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने के लिये आपको गुरु के सहारे की आवश्यकता होती है । जैसे यदि गुरु की दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा चल रही हो तो आप शिक्षक के पद हेतु प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफल हो जायेंगे । उस समय की सफलता आपको एक सर्वश्रेष्ठ अध्यापक के रूप में प्रतिष्ठित करता है । जातक स्कूल का अध्यापक बनेगा या कालेज का प्रोफेसर यह जन्मपत्रिका में बनने वाले राजयोगों और ग्रह की उच्चादि राशिगत स्थिति पर निर्भर करता है ।।

यदि जातक की जन्मपत्रिका में केन्द्रेश और त्रिकोणेश के मध्य युति या परस्पर दृष्टि संबंध बन रहा हो तो जातक निश्चित ही कालेज का प्रोफेसर बनता है । व्यक्ति किस विषय का शिक्षक होगा, यह लग्न, तृतीय, पंचम, दशम और एकादश भाव में स्थित ग्रहों अथवा इन भावों के स्वामियों से संबंध बनाने वाले ग्रहों पर मुख्य रूप से निर्भर करता है । यदि इन ग्रहों से सूर्य का सम्बन्ध बन रहा हो तो जातक प्रशासनिक, राजनीतिक विषय, धातु विज्ञान, गणित, भौतिक शास्त्र, इंजीनियरिंग तथा कृषि विज्ञान का अध्यापक होगा ।।


मित्रों, इन ग्रहों का चन्द्रमा से सम्बन्ध बने तो जातक साहित्य, गृह विज्ञान {वास्तु कला}, रसायन विज्ञान, पशुपालन, डेयरी विज्ञान, सौन्दर्य शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, पर्यटन शास्त्र, नौकायन, जलशास्त्र, नर्सिंग अथवा नक्शा बनाने के क्षेत्र का अध्यापक होगा । यदि मंगल से सम्बन्ध बने तो जातक भूगोल, खान, खनिज विज्ञान, धातु विज्ञान, रसायन विज्ञान, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, पुलिस, सेना से संबंधित विषय, पेट्रोलियम, पर्वतारोहण एवं साहसपूर्ण कार्यों से संबंधित विषयों का अध्यापक होता है ।।

उपरोक्त ग्रहों का यदि बुध से सम्बन्ध बने तो जातक वाणिज्य एवं प्रबंधक संकाय से संबंधित विषय, अर्थशास्त्र, बैंकिंग, सांख्यिकी, गणित, ज्योतिष, पत्रकारिता, प्रकाशन से संबंधित विषय, पुस्तकालय, वेद, शिक्षा शास्त्र एवं व्याकरण का अध्यापक होगा । गुरु से संबंध बने तो जातक शिक्षा शास्त्र, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, पौरोहित्य, वेद, स्मृति, विधि शास्त्र, दर्शन, तर्कशास्त्र तथा वेदान्त आदि अध्यापक होता है ।।

मित्रों, उन ग्रहों का शुक्र से सम्बन्ध बने तो जातक कला, नृत्य, संगीत, नाट्य शास्त्र, साहित्य, फिल्म तथा टेलीविजन उद्योग से संबंधित विषयों का अध्यापक होता है । शनि से सम्बन्ध जातक को इतिहास, पुरातत्व, पुराण, दर्शन, स्मृति, विदेशी भाषाओं एवं इंजीनियरिंग से संबंधित विषयों का अध्यापक बनता है । राहु से संबंध बनने पर ज्योतिष, धर्मशास्त्र, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, परामनोविज्ञान, रहस्यमय एवं प्राचीन विषयों का अध्यापक होगा । केतु से उपरोक्त ग्रहों के सम्बन्ध जातक को कला एवं चिकित्सा से संबंधित विषयों का अध्यापक बनाता है ।।

कई बार शिक्षण के क्षेत्र में जाने योग्य दशाओं के अभाव में जातक दूसरे व्यवसाय की ओर मुड़ जाता है । परन्तु उसकी अभिरुचि सदैव शिक्षण की ओर ही रहती है । ऐसे जातक को भविष्य में जब भी अवसर मिले अध्यापन की ओर प्रवृत्त हो जाता है । गुरु भारी और धीमा ग्रह माना जाता है, यह शुभ और पीत वर्ण का बताया गया है । गुरु प्रभावित जातक धीर-गम्भीर होते हैं और समाज में अच्‍छी प्रतिष्‍ठा हासिल करते हैं ।।

मित्रों, गुरु प्रभावी जातकों का डील-डौल भी बड़ा आकर्षक होता है । जब ऐसे जातक किसी भरी सभा में पहुंचते हैं जहां बैठने के लिये जगह न हो तो वहां भी कुछ लोग खिसककर या हटकर इनके लिए जगह बना देते हैं । गंभीरता और सौम्‍यता इन जातकों का प्रमुख गुण माना जाता है । जन्मकुण्डली का पंचम भाव बुद्धि, ज्ञान, कल्पना, अतीन्द्रिय ज्ञान, रचनात्मक कार्य, याददास्त एवं पूर्वजन्म के संचित कर्म को दर्शाता है । यह जातक के शिक्षा के स्तर को भी तय करता है ।।

जन्मकुण्डली का चतुर्थभाव मन का कारक भाव भी माना जाता है । यह इस बात का निर्धारण करता है कि आपकी मानसिक योग्यता किस प्रकार की शिक्षा में होगी । यदि चतुर्थ भाव का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में बैठा हो या नीच राशि, अस्त राशि या फिर शत्रु राशि में बैठा हो तथा मन का कारक ग्रह {चंद्रमा} पीड़ित हो तो ऐसे जातक का शिक्षा में मन नहीं लगता है ।।

मित्रों, जन्मकुण्डली का द्वितीय भाव वाणी, धन, संचय तथा व्यक्ति की मानसिक स्थिति को व्यक्त करता है । यह दर्शाता है कि शिक्षा आपने ग्रहण कि है वह आपके लिए उपयोगी है या नहीं । यदि इस भाव पर पाप ग्रह का प्रभाव हो तो जातक शिक्षा का उपयोग नहीं कर पाता है । जातक को बचपन से किस विषय की पढाई करवानी चाहिये इसके लिये हम मूल रूप से चार पाठ्यक्रम {विषय} को ले सकते हैं, जैसे गणित, जीव विज्ञान, कला और वाणिज्य ।। 

ज्योतिष शास्त्रानुसार गणित का कारक ग्रह बुध माना जाता है और इसका सम्बन्ध यदि जातक के लग्न, लग्नेश अथवा लग्न नक्षत्र से हो तो वह जातक गणित में सफल होता है । शनि और मंगल किसी भी प्रकार से इनसे सम्बन्ध बनायें तो जातक-मशीनरी कार्य में दक्ष होता है । जन्मकुण्डली में सूर्य का जल राशिस्थ होना, छठे एवं दशम भाव अथवा दशमेश के बीच सम्बन्ध तथा सूर्य एवं मंगल का सम्बन्ध हो तो जातक जीव विज्ञान अथवा चिकित्सा क्षेत्र की पढाई करता है ।।

मित्रों, पंचम, पंचमेश एवं शिक्षा के कारक गृह बृहस्पति का पीड़ित होना कला के क्षेत्र में पढाई का कारक बन जाता है । इन पर यदि शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो इस जातक की पढाई पूरी भी करवा देता है । लग्न और लग्नेश का सम्बन्ध बुध के साथ-साथ यदि गुरु से भी हो तो जातक वाणिज्य की पढाई सफलता पूर्वक पूर्ण करता है । पुरुष की कुण्‍डली में जहां शुक्र सांसारिकता और दैहिक सुख के लिये कारक होता है, वहीं स्‍त्री जातक के लिए गुरु महत्‍वपूर्ण होता है ।।

स्‍त्री जातक के लिए उसके पति का प्रगति करना सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है । जिस स्‍त्री जातक की कुण्‍डली में वृहस्‍पति शुभ स्‍थान और शुभ प्रभाव में होता है, उसे सामाजिक मान-प्रतिष्‍ठा और सांसारिक सुख सहजता से प्राप्त हो जाते हैं । वृहस्‍पति खराब होने पर स्‍त्री जातक को अपमान और उपेक्षा झेलनी पड़ती है । ऐसे में अधिकांश स्‍त्री जातकों को गुरु का रत्‍न पुखराज पहनना चाहिये । पुखराज रत्‍न सोने की अंगूठी में पहनने से गुरु का प्रभाव बढ़ जाता है ।।

मित्रों, जिन जातकों का गुरु मारक अथवा बाधक स्‍थान का स्वामी होता है, उनके अलावा सभी स्‍त्री जातक नि:संकोच पुखराज पहन सकती है । ऐसे ही अन्य जातक जिनकी कुण्डली में पितृदोष बन रही हो और मंगल-राहू की युति लग्न अथवा सप्तम में बने तो मनुष्य के वैवाहिक जीवन को छिन्न-भिन्न कर देती है । शनि-राहू युति अनेक बाल विधवाओं की जन्म-पत्री में देखने को मिल जायेगी ।।

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