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इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या मृत्यु भी हो सकती है ।।



इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या मृत्यु भी हो सकती है ।। In this period, there may be conflict, divorce or death by spouses.


हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz, मित्रों, सर्वप्रथम राहू केतु का पौराणिक आधार क्या है, आइये ये जन लेते हैं । पुराणों के अनुसार हिरण्यकश्यप की पुत्री सिंहिका का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था । इन दोनों के योग से वृषभानु नाम के दैत्य का जन्म हुआ । यह दैत्य जन्मजात शूर-वीर, मायावी एवं प्रखर बुद्धि का था । कहा जाता है कि उसने देवताओं की पंक्ति में बैठकर समुद्र मंथन से निकले अमृत को छल से पी लिया ।।

इस घटनाक्रम को सूर्यदेव तथा चंद्रदेव देख रहे थे । उन्होंने सारा घटनाक्रम भगवान विष्णु को बता दिया । तब क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक धड़ से अलग कर दिया । किंतु राहु अमृतपान कर चुका था, इसलिए मरा नहीं, बल्कि अमर हो गया । उसके सिर और धड़ दोनों ही अमरत्व पा गए । उसके धड़ वाले भाग का नाम केतु रख दिया गया ।। मित्रों, यही कारण है, कि राहु और केतु दोनों सूर्य और चन्द्र से शत्रुता रखते हैं । दोनों छाया ग्रह बनकर सूर्य एवं चन्द्रमा को ग्रहण लगाकर प्रभावित करते रहते हैं । ज्योतिष के विद्वानों ने राहु और केतु के प्रभावों का स्पष्ट उल्लेख किया है । राहु और केतु सदैव वक्र गति से चलते हुए एक-दूसरे से ठीक 1800 अंश की रेखीय दूरी पर रहते हैं । ये दोनों छाया ग्रह इसी गति से सदैव सूर्य का चक्कर लगाते रहते हैं ।।

एक राशि पर राहु और केतु लगभग 18 महीने अर्थात् डेढ़ वर्ष तक रहते हैं । संपूर्ण राशिपथ को पूरा करने में इन्हें अठारह वर्षों का समय लगता है । छाया ग्रह होने के कारण मूल रूप से इन्हें किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है । परन्तु कुछ ज्योतिषीगण कन्या राशि को राहु और मीन को केतु की राशि मानते हैं । कुछ लोग वृष को राहु की उच्च राशि मानते हैं तो कुछ मिथुन को ।। मित्रों, इस प्रकार स्पष्ट है, कि जो राशि राहु के लिए उच्च होगी वह केतु के लिए नीच होगी और जो राहु के लिए नीच होगी वह केतु के लिए उच्च होगी । राहु को मेष, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक या कुंभ राशि और नवम भाव में होने पर शक्तिशाली माना जाता है । नैसर्गिक रूप से इन दोनों को पाप ग्रह माना जाता है । ये जन्मकुंडली के जिस भाव में होते हैं उस भाव से पंचम, सप्तम तथा नवम भावों को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं ।।

ये दोनों जिस ग्रह की राशि पर बैठते हैं उसी के स्वभाव के अनुसार फल देते हैं । जैसे, मेष राशि में होने पर मंगल के समान, वृष राशि में शुक्र के समान, मिथुन में बुध के समान आदि-आदि । किसी भी व्यक्ति कि जन्मकुण्डली में शक्ति, हिम्मत, शौर्य, पाप कर्म, भय, शत्रुता, दुख, चिंता, दुर्भाग्य, संकट, राजनीति, कलंक, धोखा, छल-कपट आदि का अध्ययन राहु से किया जाता है ।। मित्रों, मानसिक स्तर के सभी रोग, हृदय रोग, किसी भी प्रकार के विष और विष जनित रोग, कोढ़, सर्प, भूत-प्रेत, जादू-टोने, टोटके, अचानक घटने वाली दुर्घटनाओं आदि का एक मात्र कारक और प्रतिनिधि ग्रह भी राहु ही है । जन्मराशि से प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम या दशम भाव में स्थित राहु शुभ फलदायक माना जाता है ।।

इसी प्रकार, केतु को वृश्चिक, धनु या मीन राशि में बलवान माना जाता है । कर्क और सिंह राशियां इसकी शत्रु राशि मानी जाती है । यह भी राहु के समान अचानक फल देने में सक्षम ग्रह माना जाता है । परन्तु यह केतु मोक्ष प्राप्ति का कारक ग्रह भी है और व्यक्ति के मोक्ष का विचार भी इसी से किया जाता है । इसका सबसे बड़ा गुण ये है, कि यदि यह किसी स्वगृही ग्रह के साथ हो तो उस ग्रह और उस भाव के फलों में चौगुनी वृद्धि कर देता है ।। मित्रों, बाकि का इसका सारा गुण और फल राहु के समान ही फलित होता है । राहु से दादा तथा केतु से नाना का विचार किया जाता है । अतः पितृ दोष, ब्रह्म दोष आदि के लिए इन दोनों का गहराई से अध्ययन आवश्यक होता है । दूसरी तरफ राहु+चन्द्र अथवा सूर्य के साथ होने पर ग्रहण योग तथा गुरु के साथ होने पर चांडाल योग का निर्माण करता है ।।

इस प्रकार कि स्थितियों में राहु का प्रभाव नकारात्मक होता है । किसी भी जातक की जन्मकुण्डली में राहु-केतु का विशेष रूप से अध्ययन करके यह जाना जा सकता है कि वह जातक अपने जीवन में किस ऊंचाई तक पहुंच सकता है । किसी को भी उसके जीवन में बुलंदियों पर पहुंचाने अथवा नीचे गिराने में भी यही दोनों ग्रह विशेष रूप से भूमिका निभाते हैं ।। मित्रों, किसी भी जातक के जीवन में राहु कि महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा एक वर्ष 6 माह तक रहता है । इस अवधि में जातक को असीम मानसिक कष्ट होता है । इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या फिर उसकी मृत्यु तक सम्भव हो सकती है । अपने लोगों से मतांतर, आकस्मिक संकट एवं जल जनित पीड़ा की संभावना भी रहती है । इसके अतिरिक्त इस दशा में पशु या कृषि की हानि, धन का नाश, संतान को कष्ट और मृत्युतुल्य पीड़ा भी हो सकती है ।।

राहु और चन्द्र की दशा में उपस्थित विषम परिस्थितियों से बचने के लिए अपनी माँ अथवा माता की उम्र वाली महिलाओं का सम्मान और उनकी सेवा करें । प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का शुद्ध देशी गाय के दूध से अभिषेक करें । चांदी की प्रतिमा या कोई अन्य वस्तु मौसी, बुआ या बड़ी बहन को उपहार स्वरुप दें । तथा वैदिक विद्वान् ब्राह्मणों से शिव का रुद्राभिषेक करवायें ।। वास्तु विजिटिंग के लिये तथा अपनी कुण्डली दिखाकर उचित सलाह लेने एवं अपनी कुण्डली बनवाने अथवा किसी विशिष्ट मनोकामना की पूर्ति के लिए संपर्क करें ।।

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