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ज्योतिष में कुष्ठ रोग कारक योग तथा होने से रोकने का अचूक इलाज । शुरूआती दिनों में करें ये उपाय नहीं फैलेगा आपका कुष्ठ ।। Kushtha Roga in your horoscope.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


ज्योतिष में कुष्ठ रोग कारक योग तथा होने से रोकने का अचूक इलाज । शुरूआती दिनों में करें ये उपाय नहीं फैलेगा आपका कुष्ठ ।।

मित्रों, "कुष्ठ रोग" अधिकांशतः कुण्डली में सूर्य के दूषित होने अथवा दूषित प्रभाव में होने के वजह से होता है । जीवन शक्ति का कारक ग्रह सूर्य है, इसलिए ज्योतिष में सूर्य के दुष्प्रभावों में रहने के कारण कुष्ठ रोग होना बताया गया है । कुष्ठ रोग जैसी और भी अन्य बीमारियाँ मानव शरीर में उत्पन्न होते हैं, जब ग्रहों का दुष्प्रभाव शुरू होता है ।।

मुख्य रूप से सूर्य को दूषित करने वाले ग्रह "राहु-केतु" हैं तथा कुछ हद तक शुक्र और शनि भी सूर्य को उद्विग्न करते हैं । मित्रों, किसी जातक की कुण्डली में लग्न, लग्नेश तथा सूर्य अगर किसी दुष्प्रभावों में जब होते हैं, तो कुष्ठ रोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं । सूर्य की तरह मंगल भी ऊर्जा का कारक है, इसलिए अगर जन्मकुण्डली में सूर्य के स्थान पर मंगल भी अगर दुष्प्रभावों में हो तो भी कुष्ठ रोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं ।।

मित्रों, हमारे प्राचीन ज्योतिष के ग्रन्थों में कुष्ठ रोग के कुछ योगों का वर्णन मिलता हैं । १.सूर्य, शुक्र एवं शनि, तीनों एक साथ कुण्डली में हों तो कुष्ठ रोग होने की प्रबल सम्भावना होती है । २.मंगल और शनि के साथ चन्द्रमा मेष या वृष राशि में हो तो भी ये योग प्रबल होता है । ३.चन्द्रमा, बुध एवं लग्नेश राहु या केतु के साथ हों तो ये सम्भावना बढ़ जाती है ।।

४.लग्न में मंगल, अष्टम में सूर्य और चतुर्थ में शनि हो तो कुष्ठ रोग होना लगभग निश्चित होता है । ५.मिथुन, कर्क या मीन के नवांश में स्थित चक्र पर मंगल और शनि की दृष्टि हो तो यह रोग जातक के जीवन में होता ही है । ६.वृष, कर्क, वृश्चिक या मकर राशिगत पाप ग्रहों से लग्न एवं त्रिकोण में दृष्ट या युक्त हों तो भी इसे निश्चित ही जानें । ७.शनि, मंगल, चंद्र जब जलीय तत्व राशि में हों और अशुभ ग्रह से दृष्ट हों, तो चर्म रोग होता ही है ।।

८.मंगल लग्न में, सूर्य अष्टम में और शनि चतुर्थ में हो तो कुष्ठ होना लगभग तय है । ९.चंद्र लग्न में, सूर्य सप्तम में, शनि और मंगल द्वितीय या द्वादश में हों तो भी ये योग बनता ही है । मंगल, शनि अथवा सूर्य षष्ठेश हो कर लग्न में बैठें तो भी ये योग प्रभावी होता है ।।

मित्रों, मेष लग्न की कुण्डली में सूर्य सप्तम भाव में शुक्र के साथ हो, शनि लग्न में तथा मंगल अस्त हो कर बुध के साथ बैठा हो तो कुष्ठ रोग होने की संभावना बढ़ जाती है । वृष लग्न की कुण्डली में सूर्य लग्न में शनि के साथ हो, शनि अस्त हो, शुक्र, बुध द्वादश भाव में हों और राहु पंचम या नवम् भाव में हो तो कुष्ठ रोग का प्रारंभ पैर या फिर उंगलियों से होता है ।।

मिथुन लग्न की कुण्डली में लग्नेश बुध छठे भाव में मंगल के साथ हो, सूर्य पंचम भाव में राहु या केतु के साथ बैठा हो तथा चन्द्रमा एकादश भाव में बैठे तो कुष्ठ रोग होता है । इस स्थिति में अधिकांशतः इस रोग का आरम्भ जातक के नाक से होता है । कर्क लग्न की कुण्डली में सूर्य तृतीय भाव में, चंद्र एकादश भाव में, केतु सप्तम भाव में अगर गुरु के साथ हो, तो कुष्ठ रोग होता ही हैं ।।

सिंह लग्न की कुण्डली में शुक्र और राहु लग्न में हो, सूर्य तृतीय या एकादश भाव में हो तथा शनि से दृष्ट या युक्त हो तो कुष्ठ रोग होने की संभावना होती है । कन्या लग्न की कुण्डली में लग्नेश किसी त्रिकोण में अस्त हो और लग्न पर मंगल की दृष्टि हो, शनि सूर्य को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो और शनि केतु के साथ हो तो कुष्ठ रोग की संभावना प्रबल होती है ।।

तुला लग्न की कुण्डली में सूर्य लग्न में हो, शुक्र, मंगल दशम भाव में हों, राहु-केतु किसी त्रिकोण में, गुरु सप्तम में और शनि किसी केन्द्र में बैठा हो तो कुष्ठ रोग देता है । वृश्चिक लग्न की कुण्डली में बुध, लग्न, शुक्र अस्त हों, लग्न पर राहु-केतु की दृष्टि हो, शनि किसी केन्द्र में मंगल से युक्त हो तो कुष्ठ रोग होता है ।।

धनु लग्न की कुण्डली में सूर्य अष्टम भाव में हो, चन्द्रमा अस्त हो, शुक्र सप्तम भाव में हो, गुरु किसी त्रिक स्थानों में शनि से दृष्ट या युक्त हो तो कुष्ठ रोग होता है । मकर लग्न की कुण्डली में गुरु लग्न में मंगल से युक्त हो और चन्द्रमा सप्तम भाव में राहु-केतु से दृष्ट हो, शनि अष्टम भाव में सूर्य से अस्त हो तो कुष्ठ रोग होना तय है ।।

कुंभ लग्न की कुण्डली में राहु, मंगल और गुरु तीनों सूर्य से केन्द्र में अस्त हों और चन्द्रमा लग्न में "केमद्रुम योग" बना रहा हो तो जातक को कुष्ठ रोग होता है । मीन लग्न की कुण्डली हो और शुक्र एवं चन्द्र लग्न में राहु-केतु से दृष्ट या युक्त हों तथा शनि-बुध सूर्य से अस्त हों तो कुष्ठ रोग होता ही है । मित्रों कोई भी ग्रह अपनी दशा, अंर्तदशा और गोचर के अनुसार ही जातक को रोग देता है ।।

मित्रों, इस कुष्ठ रोग का इलाज शिव का रुद्राभिषेक है । इस रोग की निवृत्ति हेतु किसी योग्य विद्वान् ज्योतिषी के सान्निध्य में वेदपाठी ब्राह्मणों से विधिपूर्वक ग्रह शान्ति करवायें । तथा उसी के अन्दर रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों से नमक-चमक से आवृति पूर्वक ग्यारह आवृति रुद्राभिषेक करवायें । तथा गाय के स्वच्छ एवं निर्मल दूध को पहले सूती कपड़े से छानकर फिर उसमें शक्कर घोलें । और इसी घोल के दूध से रुद्राभिषेक करवायें ।।

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।। नारायण नारायण ।।

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