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अतुलनीय धन दिलाने वाले कुछ राजयोग एवं विपरीत राजयोग ।।



अतुलनीय धन दिलाने वाले कुछ राजयोग एवं विपरीत राजयोग ।। Atulaniya Dhanadayak Yoga in Astrology.


 हनुमान जी महाराज, बालाजी ज्योतिष केंद्र.
हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, आज हम जन्मकुण्डली में राजयोग तथा विपरीत राजयोग के विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे । ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ "फलदीपिका" में लिखा है -

दुःस्थानमष्टमरिपुव्ययभावमाहुऊ सुस्थानमन्यभवनं शुभदं प्रदिष्टम् ।।
प्राहुर्विलग्नदशसप्तचतुर्थभानि केन्द्रं हि कण्टकचतुष्टयनामयुक्तम् ।।१७।। (अ. 1.17)

अर्थ:- जन्मकुण्डली के 6, 8, 12 भावों को दुष्टस्थान और अन्य भावों को सुस्थान कहते हैं ।’’ अन्य भावों में केन्द्र (1, 4, 7 और 10) तथा त्रिकोण (5 और 9) भाव अत्यन्त लाभकारी माने गये हैं ।।

उपरोक्त भावों में बैठे राशियों के स्वामी ग्रह जातक को जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं । इन शुभ भावों के स्वामियों की शुभ भावों में युति अथवा सम्बन्ध होने पर "राजयोग" का निर्माण होता है ।। 

जैसे:- लक्ष्मी स्थानं त्रिकोणं च केन्द्र स्थानं च वैष्णवं । 
यस्याः संयोग मात्रेण राजयोगादिकं भवेत् ।। (बृहत् पाराशर होराशास्त्रम्) 

अर्थ:- त्रिकोण स्थान (5 और 9) को माँ लक्ष्मी का स्थान कहा जाता है और केन्द्र स्थान (1, 4, 7 और 10) जो भगवान नारायण का स्थान होता है । इस प्रकार यदि इन दोनों घरों के स्वामियों की युति अथवा मिलन हो जाय तो सम्पूर्ण राजयोग का निर्माण होता है ।।

मित्रों, जिस जन्मकुण्डली में इस प्रकार की स्थिति का निर्माण हो वो जातक अपने पुरूषार्थ द्वारा प्रगति और सुख-समृद्धि का उपभोग कर संतोष प्राप्त करता है । केन्द्र व त्रिकोण के स्वामियों की परस्पर दृष्टि, युति व स्थान परिवर्तन से भी उत्तम राजयोग का निर्माण होता है ।।

छठे भाव की अशुभता रोग, चोट, ऋण और शत्रु के कारण व्यक्ति के जीवन में मिलनेवाले सुखों को कम करती है । अष्टम भाव की अशुभता जातक के आयु और स्वास्थ्य को क्षीण करते हैं एवं जातक के जीवन में वैवाहिक सुख की कमी तथा अन्य कठिनाइयों के कारण सुखों में कमी करती है ।।

द्वादश भाव की अशुभता सभी प्रकार के सुख, वैभव, धन तथा शैय्या सुख का नाश करती है । षष्ठम्, अष्टम् व द्वादश भावों को ज्योतिष के अनुसार "त्रिक" भाव की संज्ञा दी जाती है । इनमें से अष्टम भाव को सर्वाधिक अशुभ और द्वादश भाव सबसे कम अशुभ माना गया है ।।

मित्रों, ज्योतिष के सिद्धांतानुसार जिसमें "भावात् भावम्" प्रधान होता है इसका मतलब छठे से छठा अर्थात एकादश भाव, और आठवें से आठवां अर्थात तृतीय भाव को कुछ कम अशुभ माना गया है । परन्तु त्रिक भावों (6, 8 और 12) की एक विशेषता भी होती है ।।

इन भावों के स्वामी यदि अपने ही भाव में, या इनमें से किसी भाव में स्थित हों तो जातक को बिना परिश्रम के जैसे लॉटरी, सट्टा, जुआ, गड़े धन तथा वसीयत आदि के द्वारा राजयेाग से भी अधिक धन-समृद्धि और यश-प्रतिष्ठादि दे देते हैं ।।

क्योंकि स्वराशिस्थ ग्रह कभी भी अशुभ फल नहीं देता और इसी स्थिति को "विपरीत राजयोग" की संज्ञा भी दी जाती है । कुण्डली में "विपरीत राजयोग" बनाने वाले ग्रहों की अपनी दशा के समय में राजयोग से कई गुना अधिक लाभ व समृद्धि व्यक्ति को मिल जाती है ।।

विपरीत राजयोग के विषय में अन्य कई महापुरुषों ने लिखा है । जैसे महाकवि कालिदास लिखते हैं कि अष्टमेश यदि बारहवें या छठे भाव में बैठा हो और छठे भाव का मालिक यदि अष्टम् अथवा व्यय में बैठा हो तथा व्ययेश यदि षष्ठ अथवा अष्टम् भाव में हो, और इन अशुभ भावों के स्वामियों की युति, दृष्टि अथवा व्यत्यय द्वारा परस्पर सम्बन्ध भी हो, परन्तु अन्य किसी ग्रह से युति अथवा दृष्टि सम्बन्ध न हो तो जातक वैभवशाली राजराजेश्वर समान होता है ।।



मित्रों, परन्तु इस प्रकार का विशुद्ध "विपरीत राजयोग" बहुत कम जातकों की कुण्डलियों में मिलता है । अतः लाभ भी उसी अनुपात में जातक को मिलता है । "फल दीपिका" में छठे भाव के मालिक की 6, 8 अथवा 12वें भाव में स्थिति को "हर्ष योग" कहा गया है ।।


ऐसा जातक अपने जीवन में सुखी, भाग्यशाली, स्वस्थ, शत्रुहन्ता, यशस्वी, उच्च मित्रों वाला तथा उत्तम सन्तानों से युक्त होता है । परन्तु जन्मकुण्डली में अष्टमेश की ऐसी ही स्थिति "सरल योग" का निर्माण करती है । ऐसा व्यक्ति दृढ़ बुद्धि, दीर्घायु, निर्भय, वि़द्वान, पुत्र व धन से युक्त, शत्रु विजेता, सफल और विख्यात होता है ।।



मित्रों, यही समान स्थिति अगर किसी कुण्डली में द्वादशेश के साथ होती है तो "विमलयोग" बनती है । ऐसा व्यक्ति धनी, कम खर्च करने वाला, स्वतंत्र, श्रेष्ठ, गुणी और प्रसिद्ध होता है । परन्तु जन्म लग्न के साथ-साथ चन्द्र राशि से भी "विपरीत राजयोग" का आकलन करना चाहिए ।।


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