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समस्त सुखों का सार यजुर्वेद के इन मन्त्रों में ।। SarvaSukh Saram Veda Mantra

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz, 


मित्रों, वेद अर्थात जानना, वेद अर्थात ब्रह्म-परमात्मा, वेदों में लिखा अर्थात परमात्मा का आदेश । वेदः शिवो शिवो वेदः वेदाध्यायी सदाशिवः परन्तु कैसे ?

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

ओम् सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयते अभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। यजुर्वेद 34.06 ।।

भावार्थः- जो मन मनुष्यों को उसी प्रकार (इधर-उधर) ले जाता है जैसे चतुर सारथी घोडों को और जो हृदय में स्थिर है और जो जरा रहित एवं अतिशय गमनशील है मेरा वह मन अच्छे संकल्पों वाला हो (बने) ।।

पदार्थः----(यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (सुषारथिः, अश्वानिव) अच्छा सारथि घोडों को जैसे (नेनीयते) अतिशय करके (इधर उधर) ले जाता है ।।

जो मन, अच्छा सारथि (अभीशुभिः) रस्सियों से (वाजिन इव) वेग वाले घोडे को जैसे वश में रखता है वैसे मनुष्यों को नियम में रखता है ।।

(यत्) जो (हृत्प्रतिष्ठम्) हृदय में स्थित् है (अजिरम्) जरा (बुढापा) रहित है (जविष्ठम्) अतिशय गमनशील है (तत्) वह (मे) मेरा (मनः) मन (शिवसंकल्पम्) शुद्ध संकल्प वाला (अस्तु) हो ।।

ओम् यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव ।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। यजुर्वेद 23.3 ।।

अर्थ:- जो प्राणवाले और अप्राणीरूप जगत् का अपनी अनन्त महिमा से एक ही विराजमान राजा है, जो इस मनुष्यादि और गौ आदि प्राणियों के शरीर की रचना करता है ।।

हम लोग उस सुखस्वरूप सकल ऐश्वर्य को देने वाले परमात्मा के लिए अपनी सकल उत्तम सामग्री को उसकी आज्ञापालन में समर्पित करके (अर्थात् यज्ञ-हवनादि के माध्यम से) विशेष भक्ति करें ।।

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