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पितृ दोष एवं प्रेत बाधा निवारण के कुछ अत्यंत प्रभावी टिप्स ।। Pitrudosh and Pretbadha Nivaran Tips.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, हरएक व्यक्ति के जेहन में ये सवाल लगभग रहता ही है कि भूत प्रेत कैसे बनते हैं ? अथवा अगर बनते हैं तो होते कैसे हैं एवं कहाँ रहते हैं ? सृष्टि का चक्र चलायमान है और जो उत्पन्न हुआ है उसका नाश एवं दुबारा उत्पन्न होकर फिर से नाश होना निश्चित होता है ।।

यह क्रम नियमित रूप से चलता रहता है । सृष्टि के इस चक्र से मनुष्य भी बंधा है । इस चक्र की प्रक्रिया से अलग कुछ भी होने से भूत-प्रेत की योनी उत्पन्न होती है ।।

जैसे अकाल मृत्यु का होना एक ऐसा कारण है जिसे तर्क के दृष्टिकोण पर परखा जा सकता है । सृष्टि के चक्र से हटकर आत्मा भटकाव की स्थिति में आ जाती है । इसी प्रकार की आत्माओं की उपस्थिति का अहसास हम भूत-प्रेत के रूप में करते हैं ।।

मित्रों, यही आत्मा जब सृष्टि के चक्र में फिर से प्रवेश करती है तो उसके भूत होने का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है । अधिकांशतः आत्माएं अपने जीवन काल में संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को ही अपनी ओर आकृष्ट करती है ।।

इसलिए उन्हें ही उनके होने का एहसास भी होता है । आज के समय में तो कई प्रकार से मृत्यु हो जाती है । जैसे जल में डूबकर, बिजली द्वारा, अग्नि में जलकर, आपसी लड़ाई-झगड़े, प्राकृतिक आपदा एवं दुर्घटनाओं के कारण ।।

मित्रों, इस प्रकार ये कहना अनुचित नहीं होगा कि उसी रफ़्तार से भूत-प्रेतों की संख्या भी बढ़ रही है । अब भले ही वो प्रेत हमें दिखायो दें अथवा न दें परन्तु उनके होने का एहसास पितृ दोष के रूप में प्रत्यक्ष होता है ।।

आज मैं देखता हूँ, की अधिकांशतः लोग पितृ दोष से ग्रसित होते ही हैं । इस दोष के वजह से जातक का कोई भी काम बनता नहीं है । अगर जातक की कुण्डली में अन्य सूत्रानुसार राजयोग भी हो तो भी वह परेशान ही नजर आता है ।।

मित्रों, पितृ दोष मुख्य रूप से जन्म कुण्डली में दो प्रकार से निर्मित होता है । पहला सूर्यकृत पितृदोष एवं दूसरा मंगलकृत पितृ दोष । हमारे ब्लॉग पर जब आप सर्च करेंगे तो ये दोष कुण्डली में कैसे बनता है, इसपर विस्तार से मैंने लेख पूर्व में ही लिखा हुआ है ।।

इसलिए आज मैं आपलोगों को इसके निवारण की विधी का विस्तार से वर्णित करूँगा । पितृदोष कैसे बनता है, ये जानने के लिए आप इस पितृदोष शब्द जो लिंक किया है उसपर क्लिक करें ।।

मित्रों, शुक्लपक्ष के प्रथम रविवार को घर में यथा विधान से सूर्ययंत्र को स्थापित करें । सूर्य को नित्य तांबे के पात्र में जल लेकर अर्घ्य अवश्य दें । जल में लाल पुष्प, अक्षत (चावल) एवं लाल चन्दन मिलाकर जल दें तथा जब भी घर से निकलें तो यंत्र दर्शन करके निकलें ।।

भगवान सूर्य के वैदिक मन्त्र, तांत्रिक मंत्र अथवा सूर्य गायत्री – ॐ आदित्याय विद्महे, प्रभाकराय, धीमहि ! तन्नो सूर्यः प्रचोदयात् । इस मंत्र की एक माला का जप पूर्व दिशा में मुख करके प्रतिदिन करें ।।

मित्रों, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से प्रारंभ करके कम से कम 12 तथा अधिक से अधिक 30 रविवार का व्रत भी रखें । सूर्यास्त से पहले गेहूं, गुड एवं घी का बना कोई सामग्री खा कर व्रतपूर्ण करें और व्रत के दिन सूर्य स्तोत्र का पाठ भी करें ।।

अपनी जन्मकुण्डली के अनुसार अगर सुटेबुल हो तो सोने या तांबे में 5 रत्ती के ऊपर का माणिक्य रविवार के दिन विधि-विधान से धारण करें । पांच मुखी रूद्राक्ष धारण करें तथा प्रतिदिन द्वादश ज्योतिर्लिंगो का स्मरण करें ।।

मित्रों, पितृदोष वाले व्यक्ति को भूलकर भी पिता का अपमान नहीं करना चाहिए बल्कि सभी बड़े बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए । रविवार के दिन गाय को गेहूं और गुड़ खिलायें एवं स्वयं भी घर से बाहर जाते समय गुड़ खाकर निकलें ।।

दूध में शहद मिलाकर पिने से भी पितृदोष की शान्ति होती है । लाल रंग का रूमाल हरमेशा अपने पास रखें । इससे आपकी कुण्डली में सुर्यकृत पितृदोष अगर होगी तो उसके रहते भी आप अपनी जिन्दगी में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ।।

मित्रों, दूसरा होता है मंगलकृत पितृदोष । इसके निवारण के लिए आप शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार के दिन घर में मंगल यंत्र पूर्ण विधि विधान से स्थापित करें । और जब भी घर से बाहर जाएं तो यंत्र का दर्शन अवश्य करके जाएं ।।

नित्य प्रातःकाल उगते हुए सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें । मंगल के वैदिक मन्त्र, तांत्रिक मन्त्र अथवा मंगल गायत्री मन्त्र की एक माला का जप करें । ऊं अंगारकाय विद्महे, शक्तिहस्ताय धीमहि ! तन्नो भौमः प्रचोदयात् ।।

मित्रों, शुक्लपक्ष के प्रथम मंगलवार से आरंभ करके 11 मंगलवार का व्रत करें । हनुमान जी एवं शिवजी की उपासना-पूजा करें तथा भूमि पर शयन करें । मंगलवार के दिन 5 रत्ती से अधिक का मूंगा अगर सुटेबुल हो तो सोने या तांबे में धारण करें ।।

तीनमुखी रूद्राख धारण करें तथा नित्य प्रातःकाल द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करें । अपनी बहनों का भूलकर भी अपमान न करें । लालमुख वाले बंदरों को गुड़ एवं चना खिलाने से भी पितृदोष की शान्ति होती है ।। 

मित्रों, मंगलकृत पितृदोष वालों को रक्तदान अवश्य करना चाहिए । इसलिए जब भी अवसर मिले रक्तदान अवश्य करें । 100 ग्राम मसूर की दाल बहते नदी में प्रवाहित करें । सुअरों को मसूर की दाल एवं मछलियों को आटे की गोलियां अवश्य खिलाया करें ।।

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कलानिधि योग एवं उसका फल - बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है ।। 

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पारिजात योग एवं उसका फल - बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है ।। 

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कुसुम योग एवं उसका फल - बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है । 

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लक्ष्मी योग एवं उसका फल - बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के 19वें अध्याय में वर्णित अनेकयोगाध्यायः में ज्योतिष के सभी महत्वपूर्ण योगों का विस्तृत वर्णन किया गया है । जातक के जीवन में इन योगों का क्या असर होता है, इस बात का विस्तृत वर्णन हम कर रहे हैं । तो आइये जानें इस विडियो टुटोरियल में लक्ष्मी योग एवं उसके फल के विषय में - https://youtu.be/lSMgcbpwM9Y

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