Devi Stotram

अथ श्री महामाया अष्टकम् ।। Mahamaya Ashtakam.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
 Mata Lakshmi

मित्रों, माया के स्वरुप का वर्णन भागवत महापुराण में भी मिलता है । जिन तीन रूपों का वर्णन है, वो है, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती । इन्हीं तीनों के द्वारा इस सृष्टि का सञ्चालन किया जाता है ।।

इन्हीं महामाया का अष्टक जो पैङ्गनाडु-गणपतिशास्त्रि जी द्वारा रचित है । इस अष्टक के आठ श्लोकों के बाद नवम श्लोक जो महात्म्य श्लोक है उसमें लिखा है, कि विश्वास पूर्वक इस स्तोत्र का पाठ जो करता है....

उसके जीवन में धन-धान्य, असाध्य रोगों से निजात मिल जाता है । तथा हर प्रकार की सम्पदा, ऐश्वर्य, सुख-संपत्ति आदि की सहज ही प्राप्ति हो जाती है ।।
 Lakshmi Narayan.

अथ श्री महामाया अष्टकम् ।। (पैङ्गनाडु) गणपतिशास्त्रिकृतम् ।।

सत्स्वन्येष्वपि दैवतेषु बहुषु प्रायो जना भूतले
यामेकां जननीति सन्ततममी जल्पन्ति तादृग्विधा ।
भक्तस्तोमभयप्रणाशनचणा भव्याय दीव्यत्वसौ
देवी स्फोटविपाटनैकचतुरा माता महामायिका ॥ १॥

मातेत्याह्वय एव जल्पति महद् वात्सल्यमस्मासु ते
कारुण्ये तव शीतलेति यदिदं नामैव साक्षीयते ।
इत्थं वत्सलतादयानिधिरिति ख्याता त्वमस्मानिमान्
मातः कातरतां निर्वाय नितरामानन्दितानातनु ॥ २॥

प्रत्यक्षेतरवैभवैः किमितरैर्देवव्रजैस्तादृशैः
निन्दायामपि च स्तुतावपि फलं किञ्चिन्न ये तन्वते ।
या निन्दास्तवयोः फलं भगवती दत्सेऽनुरूपं क्षणान्
नूनं तादृशवैभवा विजयसे देवि त्वमेका भुवि ॥ ३॥
 Mahalakshmi
वृत्तान्तं विविधप्रकारमयि ते जल्पन्ति लोके जनाः
तत्त्वं नोपलभे तथैव न विधिं जाने त्वदाराधने ।
तस्मादम्ब कथं पुनः कलयितुं शक्तास्मि ते पूजनं
नूनं वच्मि दयानिधेऽवतु जडानस्मान् भवत्यादरात् ॥ ४॥

रोदंरोदमुदीर्णबाष्पलहरीक्लिन्नानने ते शिशा-
वस्मिन् तप्यति किञ्चिदत्र करुणादृष्टिं विधत्से न चेत् ।
पातुं स्फोटगदात् पटुत्वमिव ते कस्यास्ति मातर्वद
क्कायं गच्छतु कस्य पश्यतु मुखं का वा गतिर्लभ्यताम् ॥ ५॥

धर्म्यानुच्चरतां पथः कलयतां दोषांस्तथा चात्मनः
स्वैरं निन्दनमातनोतु सततं द्वेष्येऽपथे तिष्ठतु ।
एतावत्यपि वत्सके किल शुचं याते मनाक् तत्क्षणं
तत्त्राणे जननी प्रयास्यति हि तन्मातस्त्वमस्मानव ॥ ६॥
 Laxmi Ganesha
आबालस्थविरं प्रसिद्धमयि ते मातेति यन्नाम तद्
गोप्तुं नैव हि शक्यमम्ब तदसौ तादृग्विधा त्वं यदि ।
अस्मिन् खिद्यति वत्सके न तनुषे मातुर्गुणं चेत्तदा
नूनं स्यादपवादपात्रमयि तन्मातस्त्वमस्मानव ॥ ७॥

मुक्ताहारमनोहरद्युतियुतां मूर्तिं नरास्तावकीं
ये ध्यायन्ति मृणालतन्तुसदृशीं नाभीहृदोरन्तरे ।
ते घोरज्वरभारजातविषमस्फोटस्फुटद्दुःसह-
क्लेदोद्यत्कटुपूतिगन्धमयि नो जानन्त्यमी जात्वपि ॥ ८॥

कारुण्याम्बुधिशीतलापदपयोजातद्वयीभावना-
जातस्फीतहृदम्बुजामितसुधानिर्यासरूपामिमाम् ।
ये मर्त्या स्तुतिमादराद् गणपतेर्वक्त्राम्बुजान्निःसृतां
विश्वासेन पठन्ति ते न दधते स्फोटव्यथां जातुचित् ॥ ९॥
 Ma Mahalakshmi
।। इति श्रीमहामायाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

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