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पितृदोष या प्रेतदोष ? इसके विषय में आज कुछ विशेष ।।



पितृदोष या प्रेतदोष ? इसके विषय में आज कुछ विशेष ।। Pitru Dosha Athava Pret Dosha.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, पितृदोष की चर्चा हर जगह लगभग सुनने को मिल ही जाता है । न जाने क्यों लोग पितृदोष से इतना डरे हुए रहते हैं । वैसे अपने जीवन में असफल व्यक्ति पूर्ण प्रयास के बाद भी सफलता न मिले तो अक्सर घबरा ही जाता है ।।

वैसे तो मैंने पितृदोष पर कई लेख लिखे हुए हैं, जो आज भी हमारे ब्लॉग और वेबसाईट पर पड़े हुए हैं । आपको बड़े-से-बड़ा और विस्तृत कई लेख पितृदोष के ऊपर मिल जायेंगे हमारे ब्लॉग और वेबसाईट पर आप जाकर पढ़ सकते हैं ।।

मित्रों, आज मैं इस दोष के विषय में दो लाइन ज्यादा एवं कुछ हटके बताता हूँ । वैसे अगर आप इन्टरनेट चलाते हैं तो आपको गूगल में पितृदोष सर्च करने पर दुनियाँ भर के लेख मिल जायेंगे ।।

सभी विद्वानों का अपन-अपना मत होता है हर विषय पर । परन्तु मेरे समझ के अनुसार किसी भी जन्मकुण्डली में पितृदोष सिर्फ दो ग्रहों सूर्य एवं मंगल के पीड़ित होने से ही बनता है ।।

मित्रों, ये बात आप भी जानते हैं, कि सूर्य का संबंध पिता से तथा मंगल का संबंध रक्त से होता है । सर्वविदित है, कि सूर्य के लिए पाप ग्रह शनि, राहु और केतु माने जाते हैं ।।

यही कारण है, कि जब सूर्य का इन ग्रहों के साथ दृष्टि या युति अथवा किसी भी प्रकार का सम्बन्ध बनाये तो जन्मकुण्डली में सूर्यकृत पितृदोष का निर्माण होता है ।।

इसी प्रकार मंगल यदि राहु या केतु के साथ हो अथवा इनसे दृष्ट हो तो या फिर किसी भी प्रकार से इनका सम्बन्ध किसी जातक की जन्मकुण्डली में बने तो मंगलकृत पितृ दोष का निर्माण होता है ।।

मित्रों, सामान्यतः यह देखा गया है, कि जिस जातक की कुण्डली में सूर्यकृत पितृदोष हो उस जातक के विचार अपने परिवार या कुंटुंब के अपने से बड़े व्यक्तियों के साथ नहीं मिलते, ऐसा जातक मनमानी ज्यादा करना पसंद करते हैं ।।

अब मंगलकृत पितृदोष के विषय में जान लेते हैं । मंगलकृत पितृदोष जिस जातक की कुण्डली में हो तो उस जातक के अपने परिवार या कुटुम्ब में अपने छोटे व्यक्तियों से विचार नहीं मिलते ।।

मित्रों, ऐसे में सांसारिक जीवन के लिये ये बहुत बड़ा दोष होता है । इन हालातों में सूर्य एवं मंगल की यदि राहु से युति हो तो यह अत्यन्त विषम स्थिति पैदा कर देती है ।।

क्योंकि आपको मैंने कई बार बताया है, कि राहु एक विभक्ति कारक ग्रह है और सूर्य एवं मंगल को उनके कारकों से बिलकुल अलग कर देता है ।।
  
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।।। नारायण नारायण ।।।

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