Devi Stotram

भगवान भैरव की पूजा जन्मकुण्डली के सभी दोषों को स्वाहा कर देगी ।। Bhagwan Bhairav, Kundali ke Dosh Swaha.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


मित्रों, आपको सुख हो या दुख, हर पल भगवान का ध्यान करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है । इस प्रकार किया गया भगवान का चिंतन हमारे कई जन्मों पापों को नष्ट कर देता है । आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में बहुत कम लोग हैं, जिन्हें विधिवत भगवान की पूजा-आराधना का समय मिलता होगा ।।

वैसे तो पुण्यार्जन हेतु लगभग सभी भगवान की पूजा के लिए मन्दिर जाते हैं । परन्तु कुछ लोग केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना भर कर लेते हैं । जबकि भगवान के सामने साष्टांग प्रणाम करने पर आश्चर्यजनक शुभ फल कि प्राप्ति होती है । भगवान को साष्टांग प्रणाम करना केवल एक परंपरा या बंधन मात्र नहीं है ।।

मित्रों, इस परंपरा के पीछे बहुत ही गहरा विज्ञान भी है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा हुआ है । साष्टांग प्रणाम का सबसे बड़ा फायदा यह है, कि इससे हमारे शरीर का व्यायाम हो जाता है । साष्टांग प्रणाम की विधि यह है, कि आप भगवान के सामने बैठ जायें और फिर धीरे-धीरे पेट के बल जमीन पर लेट जायें ।।


दोनों हाथों को सिर के आगे ले जाकर उन्हें जोड़कर नमस्कार करें । इस प्रणाम से हमारे सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं । इससे स्ट्रेस (तनाव) दूर होता है इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है । ये रक्त प्रवाह स्वास्थ्य और आंखों के लिए अत्यन्त लाभप्रद होता है ।।

मित्रों, प्रणाम करने की यही विधि सबसे ज्यादा फायदेमंद है । इसका धार्मिक महत्व काफी गहरा है, ऐसा माना जाता है, कि इससे हमारा अहंकार कम होता है । भगवान के प्रति हमारे मन में समर्पण का भाव आता है । अहंकार स्वत: ही धीरे-धीरे खत्म हो जाता है ।।

जब भी हम भगवान के समक्ष तन और मन से समर्पण कर देते हैं, तो यह अवस्था निश्चित ही हमारे मन को असीम शान्ति प्रदान करती हैं । इसके अलावा इस प्रकार प्रणाम करने से हमारे जीवन की कई समस्यायें स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं ।।


मित्रों, आज रविवार है, और रविवार का एक अचूक उपाय जो आपके सभी समस्याओं का अन्त कर देगा । ऐसा अचूक उपाय आपको बताता हूँ जिससे आपकी सभी मनोकामनायें भी पूर्ण होंगीं । जी हाँ ! रविवार एवं बुधवार को भैरव की उपासना का दिन माना गया है ।।

भैरव को शिवजी का अंशावतार माना गया है । रूद्राष्टाध्याय तथा भैरव तंत्र से इस तथ्य की पुष्टि होती है । भैरव जी का रंग श्याम है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे त्रिशूल, खड़ग, खप्पर तथा नरमुंड धारण किए हुए हैं । उनका वाहन श्वान यानी कुत्ता है तथा भगवान भैरव श्मशानवासी हैं ।।

मित्रों,  भगवान भैरव भूत-प्रेत, योगिनियों के स्वामी माने जाते हैं । भक्तों पर कृपा करने तथा दुष्टों का संहार करने में सदैव तत्पर रहते हैं । भगवान भैरव अपने भक्तों के कष्टों को दूर कर बल, बुद्धि, तेज, यश, धन तथा मुक्ति तक प्रदान कर देते हैं ।।


जो कोई भी व्यक्ति भगवान भैरव को किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान भैरव का व्रत रखता है, पूजन या उनकी उपासना करता है वह समस्त कष्टों से मुक्त हो जाता है । भगवान श्री भैरवजी अपने सभी उपासकों की रक्षा दसों दिशाओं से करते हैं ।।

मित्रों, रविवार और बुधवार को कुत्ते को मिष्ठान खिलाकर फिर दूध पिलाना चाहिये । भैरव की पूजा में श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शत-नामावली का पाठ भी करना चाहिये । भगवान भैरवजी की प्रसन्नता के लिए श्री बटुक भैरव मूल मंत्र का जप करना भी शुभ फलदायी होता है ।।

बटुक भैरव जी का मूल मंत्र- ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं ॐ । वैसे तो भगवान श्री भैरवजी के अनेक रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख माने जाते हैं । हम जिन भैरवजी की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण हमें करना चाहिये ।।


मित्रों, भैरव जी के सभी रूपों में मुख्य रूप से बटुक भैरव जी की उपासना का सर्वाधिक प्रचलन है । तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है । वे इस प्रकार हैं:-

1.असितांग भैरवाय नम: ।।
2.चंड भैरवाय नम: ।।
3.रूरू भैरवाय नम: ।।
4.क्रोध भैरवाय नम: ।।
5.उन्मत्त भैरवाय नम: ।।
6.कपाल भैरवाय नम: ।।
7.भीषण भैरवाय नम: ।।

8.संहार भैरवाय नम: ।।


मित्रों, भैरवजी को क्षेत्रपाल एवं दण्डपाणि के नाम से भी जाना जाता है । भगवान श्री भैरवजी से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप "काल भैरव'' के नाम से भी विख्यात है । दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें "आमर्दक" भी कहा जाता है । कहा जाता है, कि शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल के पद पर प्रतिष्ठित किया है ।।

जिनकी जन्मकुण्डली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह यदि अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों । शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों तो वो व्यक्ति भैरवजी कि किसी भी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार, मंगलवार या बुधवार से प्रारम्भ कर बटुक भैरवजी के मूल मंत्र की एक माला (108 बार) का जप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से 40 दिन तक करे उसका कायाकल्प हो जायेगा ।।

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