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सम्भोग का उचित समय और इच्छानुसार सन्तान प्राप्ति ।। Sambhog Timings And Ichchhanusar Santan.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


मित्रों, विवाहोपरान्त प्रत्येक दम्पत्ति को संतान प्राप्ति की प्रबल उत्कंठा होती ही है । और अगर विवाह को जब दो-चार वर्ष बीत जायें तब तो कहना ही क्या है, ये उत्कंठा और भी प्रबल हो जाती है । आज के समय में जब हमारी बेटियाँ भी पढ-लिखकर काफ़ी उन्नति कर रही हैं, तो भी अधिकांश दंपतियों की भले ही कहें या फिर ना कहें दबे छुपे मन में संतान के रूप में पुत्र प्राप्ति की इच्छा ही होती है ।।


जन्मकुंडली के अनुसार संतान योग जैसा भी हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है । परन्तु हम हमारे कुछ प्रयासों से मनचाही संतान भी प्राप्त कर सकते हैं । हम अपने प्रयत्नों से तो बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं । अगर आपमें भी योग्य पुत्र प्राप्त करने की इच्छा है तो कुछ नियमों का पालन करके अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर सकते हैं । जैसे रात्रि शयन काल में स्त्री को सदैव पुरूष के बायें तरफ़ ही शयन करना चाहिये ।।


मित्रों, इस समय कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है । इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये । इस स्थिति में अगर गर्भाधान हो जाय तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा । आपका कौन सा स्वर चल रहा है, इसके लिये आप अपने नथुनों पर अंगुली रखकर जान सकते हैं ।।


परन्तु इसके विपरीत जब आपको योग्य कन्या संतान की प्राप्ति की इच्छा हो तो अपनी पत्नी को अपने दाहिनी तरफ शयन करवायें । इस स्थिति में स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा । इस समय में किये गये सम्भोग से गर्भाधान होता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवती कन्या संतान की प्राप्ति होगी ।।


मित्रों, मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में संभोग से पुरूष रुग्णता को प्राप्त होता है । पांचवी रात्रि में संभोग से कन्या, छठी रात्रि में पुत्र, सातवी रात्रि में बंध्या पुत्री, आठवीं रात्रि के संभोग से ऐश्वर्यशाली पुत्र, नवी रात्रि में ऐश्वर्यशालिनी पुत्री, दसवीं रात्रि के संभोग से अति श्रेष्ठ पुत्र, ग्यारहवीं रात्रि के संभोग से सुंदर पर संदिग्ध आचरण वाली कन्या, बारहवीं रात्रि से श्रेष्ठ और गुणवान पुत्र, तेरहवी रात्रि में चिंतावर्धक कन्या एवम चौदहवीं रात्रि के संभोग से सदगुणी और बलवान पुत्र की प्राप्ति होती है ।।


पंद्रहवीं रात्रि के संभोग से लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री और सोलहवीं रात्रि के संभोग से गर्भाधान होने पर सर्वज्ञ पुत्र संतान की प्राप्ति होती है । इसके बाद किये गये सम्भोग से गर्भाधान होता ही नहीं और यदि कदाचित् हो भी जाय तो अक्सर संतान नष्ट हो जाती है अथवा होती ही नहीं । इसलिये यदि आप अपने जीवन में इच्छित संतान प्राप्ति के लिए उपरोक्त तथ्यों का ध्यान रखते हुये कर्म करना चाहिये ।।


विशिष्ट निर्देश - जिन लोगों को सुन्दर, दीर्घायु और स्वस्थ संतान चाहिये उन्हें गडांत, ग्रहण, सूर्योदय एवम सूर्यास्त्काल, निधन नक्षत्र, रिक्ता तिथि, दिवाकाल, भद्रा, पर्वकाल, अमावस्या, श्राद्ध के दिन, गंड तिथि, गंड नक्षत्र तथा आंठवें चंद्रमा का त्याग करके शुभ मुहुर्त में संभोग करना चाहिये । पुराने समय में पति-पत्नी आज की तरह हर रात्रि को नही मिलते थे उनका सहवास सिर्फ़ संतान प्राप्ति के उद्देष्य के लिये ही होता था ।।


शुभ दिन और शुभ मुहुर्त के संभोग से वो योग्य संतान प्राप्त करते थे । शास्त्रानुसार कहें तो आज के समय में युवाओं की उदंडता, अनुशासनहीनता, लडाई-झगडे की प्रवॄति वाले उग्रवादी होने के लिये वास्तव में उनके माता पिता ही जिम्मेदार हैं । क्योंकि वे किसी भी दिन, किसी भी समय संभोग करके गर्भ धारण करके संतान पैदा कर लेते हैं ।।


मित्रों, जन्मकुंडली के अनुसार यदि बात करें तो गर्भाधान के समय किसी केन्द्र एवम किसी त्रिकोण में शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम का चन्द्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय यदि सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से सम्भोग किया जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है ।।


परन्तु इस समय में भी पुरूष का दायां तथा स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये । यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो व्यर्थ नहीं जाता । इसमें वैज्ञानिक कारण यह है, कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है । इसके वजह से अधिक मात्रा में पुलिंग शुक्राणु निकलते हैं, इसलिये पुत्र ही उत्पन्न होता है ।।


मित्रों, यदि आप सन्तान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सिर्फ सम्भोग ही करना हो तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सम्भोग कर सकते हैं । इस काल में गर्भाधान की संभावना नहीं के बराबर होती है । परन्तु जब तीन चार मास का गर्भ हो जाये तो किसी भी दम्पत्ति को सहवास नही करना चाहिये । अगर इसके बाद भी सम्भोग करते हैं तो भावी संतान अपंग या फिर रोगी पैदा होने की सम्भावनायें बढ़ जाती है ।।


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