जन्मकुण्डली के अनुसार आपके जीवन में धन कैसे और कब आयेगा? Jivan Me Dhan Kab And Kaise Aayega.
हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
मित्रों, धन तथा जीवन में ऐसो-आराम सभी चाहते हैं। परन्तु चाहने मात्र से किसी को नहीं मिलता। संस्कृत में एक कहावत है, कि भाग्यं फलति सर्वदा न विद्या न च पौरुषम् अर्थात भाग्य के अनुसार ही व्यक्ति के जीवन में धन एवं सुख की प्राप्ति होती है। एक-से-एक विद्वान हमने देखे हैं, परन्तु कभी-कभी एम्. बी. ए. की डिग्री वालों को भी सड़क पर भटकते हुये देखा है।।
अर्थात विद्वान होते हुये भी जीवन में सफलता नहीं मिलती। लोग कहते हैं, कि पढ़ाई में ही सब कुछ है। परिश्रम करनेवाले भी बहुत देखे हैं पर उनकी भी हालत किसी दरिद्र की तरह ही देखा है। परन्तु कुछ ऐसे भी देखे हैं, जिन्हें बोलना और ठीक से चलना भी नहीं आता परन्तु वो करोड़पति हैं। आखिर ये होता कैसे और क्यों है? इसीलिये उपरोक्त कहावत हमने कहा - भाग्यं फलति सर्वदा। अर्थात इन सभी योग्यताओं के बाद भी भाग्य ही फलित होता है।।
मित्रों, भाग्यवान होने का भी ये अर्थ कदापि नहीं है, कि आप भाग्य के भरोसे अपना सारा काम-काज बन्द करके बैठ जायें। ऐसा करने पर भी कुछ हाथ नहीं लगता, हाथ मलते ही रह जाना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार धन प्राप्ति का जो समय है, ऐसे कुछ सूत्र बताता हूँ। कुण्डली में केन्द्र तथा त्रिकोण का स्वामी अथवा अन्य शुभ भावों का स्वामी ग्रह जो होता है, वो जातक को धन, पद-प्रतिष्ठा एवं समस्त ऐसो-आराम आदि वांछित पदार्थों को देता है।।
इसके अलावा जो भाव पापी है तथा उन भावों के स्वामी यदि केवल पाप प्रभाव में ही हों तो जातक के पापत्व का नाश करके जातक को धन-धान्य आदि प्रदान करते हैं। ग्रहों के द्वारा यह पता लग सकता है कि ग्रह की कीमत कितने रुपये की है और एक ही लग्न में अगर अलग अलग प्रकार के ग्रह हैं तो वे अलग अलग कीमत का बखान करेंगे। लेकिन उस ग्रह की कीमत तब और बढ जाती है, जब वह साधारण बली नहीं बल्कि अति बली स्थिति होता है।।
मित्रों, किसी जातक की कुण्डली में धनेश की दशा में कोई भी बात कहने से पहले यह पता करें, कि कुण्डली का स्तर क्या है? यह बात शुभ धनदायक ग्रहों के योगों से ही पता लग सकती है। शुभ योगों की संख्या जितनी अधिक होती है उतना ही अधिक जातक को धन की प्राप्ति होती है। धनदायक योगों के लिये पहले शुक्र को देखना होगा, कि वह एक या एक से अधिक लग्नों में बैठा है क्या।।
लग्न या लग्नेश से दूसरे, पञ्चम, नवम तथा एकादश भाव के बलवान स्वामियों की परस्पर युति हो अथवा इनकी शुभ दृष्टि इनपर हो। कुण्डली में नवमेश दशमेश का सम्बन्ध, चौथे और पांचवें भाव के स्वामियों का सम्बन्ध, सप्तमेश शुभ हो तथा नवमेश के साथ उसका संबन्ध हो अथवा पंचमेश और सप्तमेश का शुभ सम्बन्ध भी अतुलनीय धन का योग बनाता है।।
लग्न या लग्नेश से दूसरे, पञ्चम, नवम तथा एकादश भाव के बलवान स्वामियों की परस्पर युति हो अथवा इनकी शुभ दृष्टि इनपर हो। कुण्डली में नवमेश दशमेश का सम्बन्ध, चौथे और पांचवें भाव के स्वामियों का सम्बन्ध, सप्तमेश शुभ हो तथा नवमेश के साथ उसका संबन्ध हो अथवा पंचमेश और सप्तमेश का शुभ सम्बन्ध भी अतुलनीय धन का योग बनाता है।।
मित्रों, तीन, छ:, आठ और बारहवें भावों के स्वामी अगर अपनी राशियों से बुरे भावों में बैठें और बुरे ही ग्रहों द्वारा देखे जायें तो भी धन के योग बनाते हैं। उदाहरण के लिए जैसे मेष लग्न की कुण्डली में बुध वृश्चिक राशि में अष्टम भाव में बैठा हो और शनि के पाप प्रभाव में हो तो मारकेश बुध बहुत निर्बल हो जायेगा और यह जातक का अनिष्ट करने लायक नहीं रह जायेगा।।
दूसरा कारण यह बुध अनिष्टदायक भाव में होकर अपने शत्रु की राशि में होगा तथा शनि द्वारा दृष्ट होकर असहाय जैसा हो जायेगा ऐसे वह किसी का क्या बुरा कर सकता है। तीसरा कारण यह बुध तृतीय घर से छठे स्थान में विराजमान होगा और छठे स्थान से तीसरा होकर और बुरी स्थिति में होगा। अभिप्राय यह है, कि कोई शत्रु ग्रह अथवा कोई बाधक ग्रह कमजोर हो तो जातक के लिए अच्छी बात ही है, क्योंकि वो अपनी दशा में भी कोई अनिष्ट नहीं कर पायेगा।।
दूसरा कारण यह बुध अनिष्टदायक भाव में होकर अपने शत्रु की राशि में होगा तथा शनि द्वारा दृष्ट होकर असहाय जैसा हो जायेगा ऐसे वह किसी का क्या बुरा कर सकता है। तीसरा कारण यह बुध तृतीय घर से छठे स्थान में विराजमान होगा और छठे स्थान से तीसरा होकर और बुरी स्थिति में होगा। अभिप्राय यह है, कि कोई शत्रु ग्रह अथवा कोई बाधक ग्रह कमजोर हो तो जातक के लिए अच्छी बात ही है, क्योंकि वो अपनी दशा में भी कोई अनिष्ट नहीं कर पायेगा।।
मित्रों, कुण्डली में सभी लग्नों के स्वामी आपस में युति करें तो भी धन दायक योग बन जाता है। शुक्र गुरु से बारहवें भाव में बैठ जावे तो भी धन दायक होता है। चार या चार से अधिक भावों का अपने स्वामियों से द्र्ष्ट होने पर भी धनदायक योग बनता है। किसी ग्रह का तीनों लग्नों से शुभ बन जाना भी धनदायक योग बना देता है। सूर्य या चन्द्र का नीच भंग हो जाना भी धनदायक बन जाता है।।
कोई उच्च का ग्रह शुभ स्थान में चला जाये और जिस स्थान में वह उच्च का ग्रह गया उसका स्वामी भी उच्च का हो जाये तो भी धनदायक योग बनता है। शुभ भाव का स्वामी अगर बक्री हो जाये तो भी धनदायक योग बनता है। यदि यह सब कारण तीनों लग्नों में आ जाये तो शुभता कई गुनी बढ जाती है। चलिए अब अपने अगले लेख में हम "धन किस क्षेत्र से और कब आयेगा" इस विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे।।
कोई उच्च का ग्रह शुभ स्थान में चला जाये और जिस स्थान में वह उच्च का ग्रह गया उसका स्वामी भी उच्च का हो जाये तो भी धनदायक योग बनता है। शुभ भाव का स्वामी अगर बक्री हो जाये तो भी धनदायक योग बनता है। यदि यह सब कारण तीनों लग्नों में आ जाये तो शुभता कई गुनी बढ जाती है। चलिए अब अपने अगले लेख में हम "धन किस क्षेत्र से और कब आयेगा" इस विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे।।
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।।। नारायण नारायण ।।।


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