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घर के पूजा कक्ष में पूजन कैसे करें, कौन सी वस्तु कहाँ रखें तथा क्या करें और क्या ना करें ।।

घर के पूजा कक्ष में पूजन कैसे करें, कौन सी वस्तु कहाँ रखें तथा क्या करें और क्या ना करें ।। Nitya Karma And Puajan Vishayak Mahatvapurna Jankariyan.


 Tirupati Balaji.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


मित्रों, मेरे अनुभव के आधार पर लगभग सभी हिन्दू मान्यताओं से प्रभावित व्यक्ति अपने घर में पूजा का मन्दिर रखते ही हैं । पूजा, भक्ति, साधना एवं अनुष्ठान आदि सभी का लगभग उद्देश्य एक ही होता है, घर और मन में शान्ति तथा जीवन में उन्नति । पूजा के विविध तरीके हैं, ऐसा नहीं की आप बहुत बड़ा आयोजन अथवा बहुत बड़ी रकम खर्च करके ही कर-करवा सकते हैं ।।


पूजा आप बिना कोई धन का खर्च किये भी कर सकते हैं । एक उपचार से पूजा कर सकते हैं, इसके अलावा पंचोपचार, षोडशोपचार, सहस्रोपचार, राजोपचार एवं अनन्तोपचार से देवपूजन का विधान बताया गया है । आप केवल किसी मन्दिर में जाकर हाथ जोकर प्रार्थना करते हैं तो वो आपका एकोपचार से भगवान का पूजन हो जाता है ।।


मित्रों, मन्दिर में जाते समय फुल, फूलमाला, नैवेद्य के लिए कुछ मिठाइयाँ, शिवजी के लिए एक लोटा जल आदि लेकर जाते हैं तो आपका पंचोपचार से पूजन हो जाता है । इसके आगे समन्त्रक ब्राह्मण के साथ अगर कुछ और पूजन सामग्री वस्त्रादि के साथ करते हैं तो षोडशोपचार से पूजन-अनुष्ठान हो जाता है । अब इसको बढाते चले जायेंगे तो सहस्रोपचार, राजोपचार एवं अनन्तोपचार यज्ञादि के साथ होता अथवा किया-करवाया जाता है ।।


चलिये अब बात करते है, कि पूजा अपने घर में किस प्रकार एवं कितने देवताओं का करें । किस देवता पर कौन सी सामग्री चढ़ायें अथवा न चढायें । सर्वप्रथम ये जान लें कि किसी भी गृहस्थ व्यक्ति को अपने घर में किसी एक ही मूर्ति की पूजा नहीं करना चाहिये । अपितु विभिन्न कामनाओं के अनुसार अनेकों देवी-देवताओं की पूजा कर सकते हैं । घर के पूजन स्थल अर्थात मन्दिर में दो शिवलिंग और तीन गणेश जी की मूर्ति नहीं रखनी चाहिये ।।


मित्रों, शास्त्रानुसार भगवान शालिग्राम की शिला जितनी छोटी हो वो उतनी ही ज्यादा फलदायक होती है । पूजन काल में कुशा की पवित्री के अभाव में स्वर्ण अथवा किसी भी धातु की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है । मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना गया है । पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए । ध्यान रखें कि स्त्रियों के बायें हाथ में ही रक्षाबंधन किया जाता हैं ।।


पानी, दूध, दही, घी आदि के पात्र के अन्दर अपनी अंगुली नहीं डालना चाहिए । इन्हें किसी पात्र में रखें तथा चम्मच या फिर आम्र पल्लव आदि से लेवें क्योंकि नख के स्पर्श से उपरोक्त वस्तुयें अपवित्र हो जाती हैं और देव पूजा के योग्य नहीं रह जाती । तांबे के पात्र में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं रखना चाहिए क्योंकि दूध, दही तथा पञ्चामृत आदि ताम्रपात्र के स्पर्श मात्र से ही मदिरा के समान हो जाते हैं ।।


मित्रों, आचमन तीन बार करने का विधान हैं । ब्राह्मण को आचमन का जल इतना लेना चाहिये कि पीने के बाद जल उसके नाभि तक जाय । क्षत्रिय को ह्रदय तक, वैश्य को कंठ तक तथा शुद्र को होठों तक अर्थात स्पर्श से भी आचमन हो जाता है । इससे त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं । आचमन के बाद हस्त प्रक्षालन अवश्य करना चाहिये । कुछ मतानुसार दाहिने कान का स्पर्श करने से भी आचमन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है ।।


कुशा के अग्रभाग से कभी भूलकर भी देवताओं पर जल नहीं छिड़कना चाहिये । स्नान करवाते समय देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अंगूठे से नहीं मलना चाहिये । चकले पर से सीधा भगवान के माथे पर चन्दन नहीं लगाना चाहिये बल्कि उसे किसी धातु की छोटी सी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर ही लगाना चाहिये । पुष्पों को बाल्टी, लोटा अथवा किसी भी पात्र के जल में डालकर फिर निकालकर भगवान को नहीं चढ़ाना चाहिए ।।


मित्रों, भगवान के पूजन के बाद उनकी आरती अवश्य ही उतारना चाहिये । आरती उतारने की प्रक्रिया ये है, कि भगवान के श्री चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार भी उतार सकते हैं । इस प्रकार आरती उतारने के बाद भगवान के समस्त अंगों की सात बार आरती उतारनी चाहिये । भगवान की आरती के समय घंट, नगारें, झांझर, थाली तथा शंख इत्यादि अवश्य बजाने चाहिये ।।


आरती के समय बजने वाले इन वाद्ययंत्रों की ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल में उपस्थित अनेकों रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । नाद ब्रह्म होता हैं और नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती है उसमें असीम शक्तियाँ समाहित होती हैं । भगवान के नैवेद्य के लिए लोहे के पात्र का उपयोग कदापि नहीं करना चाहिये । हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें ।।


मित्रों, हवन के लिये जिन समिधाओं के रूप में लकड़ियों जैसे नवग्रह की लकड़ी आदि का प्रयोग करते हैं उन्हें आपके अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए । साथ ही किसी भी तरह की समिधाओं का प्रयोग करें उसकी लम्बाई दस अंगुल से ज्यादा लम्बी नहीं होनी चाहिए । छाल रहित अथवा कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं । पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करना चाहिये ।।


जप के लिए प्रयुक्त होनेवाली मालाओं को मेरूहीन नहीं होना चाहिये । जप करते समय माला के मेरू का लंघन करके अर्थात उसको पार करके माला नहीं जपनी चाहिए । माला रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गयी है । माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए । जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र भी नहीं रखना चाहिये । तिलक लगाते या लगवाते समय सिर पर हाथ या वस्त्र अवश्य रखना चाहिए ।।


मित्रों, जब भी जप के लिए बैठें माला हाथ में ग्रहण करने से पहले माला का पूजन करके ही ग्रहण करें फिर जप करना चाहिए । ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए । जप करते हुए, जल में खड़े होकर स्नान-जप-ध्यान आदि करते हुये, दौड़ते हुए तथा श्मशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार नहीं करना चाहिये । चाहे कोई भी क्यों न हो बिना नमस्कार किए किसी को भी आशीर्वाद नहीं देना चाहिये ।।


एक हाथ से किसी को भी प्रणाम नहीं करना चाहिए तथा ऐसा करनेवाले को आशीर्वाद नहीं देना चाहिये । सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श कदापि नहीं करना चाहिए । बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करना चाहिये । जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए । बिना होंठ या जीभ हिले किये जाने वाले जप को उपांशु जप कहते हैं तथा इसका फल सौगुणा ज्यादा फलदायक होता हैं ।।


मित्रों, जप करते समय दाहिने हाथ को माला सहित किसी कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए । जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए । संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं तथा दीपक से दीपक जलाना निषिद्ध बताया गया है । यज्ञ एवं श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं ।।


शनिवार को पीपल वृक्ष में श्रद्धापूर्वक जल चढ़ाना चाहिए । जल चढाकर पीपल की सात परिक्रमा भी अवश्य करनी चाहिए । देवपूजन की प्रक्रिया में देवताओं की परिक्रमा करना श्रेष्ठ माना गया है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए । कुम्हड़ा तथा नारियल आदि को स्त्रियों को नहीं तोड़ना चाहिये अथवा चाकू आदि से नहीं काटना चाहिये । भोजन प्रसाद को भूलकर भी सूंघना या लाघंना नहीं चाहिए इससे भोजन अशुद्ध हो जाता है ।।


मित्रों, कहीं भी कोई मन्दिर, देवस्थल अथवा देवताओं की प्रतिमा आदि को देखकर प्रणाम अवश्य करना चाहिये । किसी को भी कोई वस्तु अथवा दान-दक्षिणा आदि दाहिने हाथ से ही देना चाहिए । एकादशी, अमावस्या, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध आदि के दिनों में क्षौर-कर्म (दाढ़ी-बाल आदि) नहीं बनाना-बनवाना चाहिए इससे धन और धर्म दोनों की हानि होती है ।।


बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के कोई भी धार्मिक कार्य निष्फल हो जाता है । यदि शिखा नहीं हो तो स्थान को ही स्पर्श कर लेना चाहिए । शिवजी की जलहारी उत्तराभिमुख रखना चाहिये । गणेश को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिये हाँ भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चढ़ा सकते हैं इस दिन चढ़ती है । भगवान शिव को बिलवपत्र, विष्णु को तुलसी, गणेश को दूर्वा, लक्ष्मी को कमल का फुल तथा दुर्गा को रक्तपुष्प अति प्रिय है ।।


मित्रों, भगवान शिव को बिल्वपत्र और भगवान विष्णु को तुलसी इतनी प्रिय है, कि एक ही को बार-बार धोकर अथवा सुखी हुई भी चढ़ाने से उतना ही फल मिलता है । भगवान शिव को कुमकुम नहीं चढ़ाना चाहिये हाँ शिवरात्रि के दिन कुंकुम भी चढ़ती है चढ़ा सकते हैं । शिवजी को कुंद, विष्णु को धतूरा, देवी को आकडे की और सूर्य को तगर के फूल नहीं चढ़ाना चाहिये । अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एकबार धोकर चढ़ाना चाहिये ।।


भगवान विष्णु को चावल, गणेश को तुलसी, दुर्गा और सूर्य को बिल्वपत्र नहीं चढ़ाना चाहिये । पत्र, पुष्प तथा फल आदि का मुख नीचे करके नहीं चढ़ाना चाहिये वे जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ाना चाहिये । किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर भगवान शिव पर चढ़ाना चाहिये । पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ाना चाहिये तथा सड़ा हुआ पान या फल-फुल आदि नहीं चढ़ाना चाहिये ।।


मित्रों, पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता अथवा माना जाता है । दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होता अथवा माना जाता है । सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियायें करनी चाहिए । पूजन पर बैठने से पहले ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा पर बैठें । पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें । घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता के दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर तब प्रज्वलित करें ।।

बालाजी वेद, वास्तु एवं ज्योतिष विद्यालय, सिलवासा ।।

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